Ranjeet Bhartiya 20/12/2021
नहीं रहे सबके प्यारे ‘गजोधर भैया’। राजू श्रीवास्तव ने 58 की उम्र में ली अंतिम सांस। राजू श्रीवास्तव को दिल का दौरा पड़ा था जिसके बाद से वो 41 दिनों से दिल्ली के एम्स में भर्ती थे। उनकी आत्मा को शांति मिले, मुझे विश्वास है कि भगवान ने उसे इस धरती पर रहते हुए जो भी अच्छा काम किया है, उसके लिए खुले हाथों से स्वीकार करेंगे #RajuSrivastav #IndianComedian #Delhi #AIMS Jankaritoday.com अब Google News पर। अपनेे जाति के ताजा अपडेट के लिए Subscribe करेेेेेेेेेेेें।
 

Last Updated on 05/06/2022 by Sarvan Kumar

बाबरिया (Babaria or Babariya) भारत में पाई जाने वाली एक खानाबदोश जनजाति है. इन्हें बौरिया (Bauria), बावरिया (Bawaria) और बरैया (Baraiya) के नाम से भी जाना जाता हैं. पारंपरिक रूप से यह खानाबदोश जनजाति छोटे और बड़े जानवरों के कुशल ट्रैकर्स और शिकारी के रूप में ख्याति रखते हैं, इसीलिए इन्हें “शिकारी जनजाति” कहा जाता है. यह जानवरों के उत्पाद को खुद खाते और उपयोग करते हैं तथा ग्रामीणों को बेच कर अपना जीवन यापन करते हैं. शिकार करने में यह इतने माहिर थे कि इस योग्यता के कारण कुलीन और राज घराने के लोग भी इनकी सेवाएं लेते थे. रिजर्वेशन सिस्टम की अंतर्गत इन्हें अनुसूचित जनजाति (Scheduled Caste, SC) के रूप में वर्गीकृत किया गया है. यह मुख्य रूप से हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में पाए जाते हैं. उत्तर प्रदेश में बावरिया जनजाति के सबसे ज्यादा लोग शामली जिले में रहते हैं. यह हिंदू धर्म को मानते हैं.आइए जानते हैं बाबरिया समाज का इतिहास, बाबरिया की उत्पति कैसे हुई?

बाबरिया जनजाति की उत्पत्ति

राजस्थान में निवास करने वाले बाबरिया जनजाति के एक सर्वेक्षण के अनुसार, इनकी उत्पत्ति के बारे में दो मान्यताएं प्रचलित हैं. पहली मान्यता के अनुसार, इस जनजाति के लोग खुद को दाना नामक एक व्यक्ति के वंशज होने का दावा करते हैं, जो कभी नगरकोट के पास रहा करते थे. इस जनजाति के लोग कहते हैं कि लगभग एक सहस्राब्दी पहले दाना ने एक देवी से विवाह किया था. यह आज भी काली, शेड देवी और ठाकरजी के साथ उस देवी की पूजा करते हैं. दूसरी मान्यता के अनुसार, इनका मानना है कि सृष्टि निर्माण के समय भगवान ने उन्हें समाज से निर्वासित करके जंगलों में रहने और चोरी करने का श्राप दिया था.

बाबरिया समाज का इतिहास

हालांकि इन्हें ऐतिहासिक रुप से एक आदिवासी जाति माना जाता है, लेकिन आधुनिक अध्ययनों से पता चलता है कि इनमें और जाट समुदाय के बीच बहुत कम भिन्नता है. इससे यह संकेत मिलता है कि कभी यह जाट समुदाय का हिस्सा रहे होंगे. समय के साथ इस जनजाति में कई बदलाव आए. पहले यह भाड़े के सैनिकों के काम करते थे, बाद में खेती करने लगे. 13वीं शताब्दी में के अंत तक, दक्कन सल्तनत के उदय के साथ इस समुदाय में बिखराव आ गया. नए शासकों ने राजपूत साम्राज्य पर नियंत्रण कर लिया. इसका परिणाम यह हुआ कि इस जनजाति के लोग खानाबदोश हो गए और जीवन यापन के लिए छोटे-मोटे अपराध जैसे चोरी आदि करने लगे. इसके कारण अन्य समुदायों के लोगों और बसे हुए जमींदारों के मन में इनके प्रति अविश्वास पैदा हो गया.

क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट 1871और बाबरिया जनजाति

1857 में आजादी की पहली लड़ाई में कबीलाई और खानाबदोश जनजातियों ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा हिस्सा लिया था. अंग्रेज इस विद्रोह से सतर्क होकर ऐसे लोगों को नियंत्रण करने के लिए कई प्रकार के नए कानून बनाने लगे. ब्रिटिश शासन के दौरान, क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट (1871) के तहत जिन जनजातियों को आपराधिक जनजाति के रूप में घोषित किया गया था, उनमें बावरिया जनजाति भी शामिल थी. इस काले कानून के तहत पूरे समुदाय को अपराधियों की श्रेणी में रखा गया था. इन्हें अपने नजदीकी पुलिस स्टेशन में रोजाना तीन बार हाजिरी देनी पड़ती थी. बच्चों और बूढ़ों तक को नहीं छोड़ा गया था. दूसरे गांव या क्षेत्रों में जाने के लिए इन्हें अनुमति लेनी पड़ती थी. तभी से इस जनजाति पर “आपराधिक जनजाति” का ठप्पा लग गया. आजादी के कुछ साल बाद ‘आपराधिक जनजाति अधिनियम’ को समाप्त कर दिया गया और इन सभी जनजातियों को ‘विमुक्त’ कर दिया. लेकिन आज भी समाज और प्रशासन की नजर में, इन खानाबदोश जनजातियों को अपराधी की तरह से देखने का जो नज़रिया था, वह बना रहा. इसके कारण आज भी यह समाज कई प्रकार के कठिनाइयों का सामना कर रहा है

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