Sarvan Kumar 29/11/2021
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Last Updated on 29/11/2021 by Sarvan Kumar

भरभुंजा या भारभुंज (Bharbhunja or Bharbhunj) भारत में पाई जाने वाली एक जाति है. इन्हें अलग-अलग राज्यों में भिन्न-भिन्न नामों से जाना जाता है. इन्हें महाराष्ट्र में कलेंरा, पंजाब में मेहरा और उत्तर प्रदेश में भुरजी कहा जाता है. महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में निवास करने वाले भरभुंजा आज भी सूखे अनाज बेचने के अपने पारंपरिक व्यवसाय में लिप्त हैं. हालांकि अन्य व्यवसायिक जातियों की तरह, इस समुदाय के पारंपरिक व्यवसाय में भी गिरावट दर्ज की गई है. अधिकांश भरभुंजा मजदूरी या छोटे-मोटे व्यवसाय करके अपना जीवन यापन करते हैं. कुछ शिक्षा प्राप्त करके इंजीनियर, डॉक्टर बन गए हैं और आधुनिक नौकरी पेशा में भी कार्यरत हैं. मुख्य रूप से उत्तर भारत और महाराष्ट्र में पाए जाते हैं. पंजाब और उत्तर प्रदेश में भी इनकी आबादी है. थोड़ी बहुत संख्या में यह नेपाल के तराई क्षेत्र में भी निवास करते हैं. धर्म से यह हिंदू, मुसलमान या सिख हो सकते हैं. लेकिन ज्यादातर भरभुंजा हिंदू धर्म को मानते हैं. मुस्लिम भरभुंजा मुख्य रूप से गुजरात और उत्तर प्रदेश में पाए जाते हैं. उत्तर प्रदेश में इन्हें भरभुंजा शेख भी कहा जाता है.यह हिंदी, मराठी, पंजाबी और भोजपुरी भाषा बोलते हैं. आइए जानते हैं भरभुंजा जाति का इतिहास, भरभुंजा शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई?

भरभुंजा जाति की उप-जातियां

महाराष्ट्र में यह तीन उप समूहों में विभाजित हैं-भड़ भुंजारी, परदेशी भुंजारी और भोई भुंजारी. ये उप समूह अलग-अलग क्षेत्रों से अपनी उत्पत्ति का दावा करते हैं. भड़ भुंजारी गुजरात से, परदेशी भुंजारी मध्य प्रदेश से और भोई भुंजारी राजस्थान से अपनी उत्पत्ति का दावा करते हैं. यह तीनों उप समूह भाषा में भी अलग होते हैं. हैं-भड़ भुंजारी अभी भी गुजराती बोलते हैं, जबकि अन्य समूह मराठी भाषा बोलते हैं. भड़ भुंजारी मुख्य रूप से महाराष्ट्र के नासिक, पुणे, ठाणे, अहमदनगर और मुंबई जिलों में पाए जाते हैं. हिंदू भरभुंजा में पाए जाने वाले प्रमुख कुल हैं-प्रमुख कुल हैं- परमार, पोवार, परोटिया, जाधव, शिंदे और चौहान, जिन्हें उपनाम के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है.

भरभुंजा शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई?

भरभुंजा शब्द की उत्पत्ति हिंदी के शब्द “भुंजा” से हुई है, जिसका अर्थ होता है- चना. पारंपरिक रूप से चना भूनने के व्यवसाय से जुड़े होने के कारण इनका नाम भरभुंजा पड़ा. इनके उत्पत्ति के बारे में कहा जाता है कि यह मूल रूप से अग्रवाल जाति के थे. लेकिन जब इन्होंने चना भूनने  का काम शुरू की तो अग्रवाल जाति से अलग हो गए.अब दोनों समुदायों के बीच अंतर्विवाह का चलन भी नहीं है.

 

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