Sarvan Kumar 27/06/2021

“ना मृत्यू का भय वीरों ना जीवन से प्रित,
शीश कटे पर धड़ लड़े यही राजपूत रीत….!”

राजपूत, नाम सुनते ही रगो में खून दौड़ पड़ता है। पुरा बदन जोश से भड़ जाता है। इनके वीरता के कहानियों से पूरा इतिहास भरा पड़ा है। पृथ्वीराज चौहान, महाराणा प्रताप राणा सांगा, वीर कुंवर सिंह जैसे योद्धाओं ने राजपूत जाति का मान आसमान तक पहुंचाया है। आज भी राजपूतों का समाज में बहुत बड़ा सम्मान है। लोग अपने आप को राजपूत होने पर गौरवान्वित महसूस करते हैं। ये वीर राजपूत कहाँ से आये, राजपूत जाति का इतिहास क्या है? राजपूतों की उत्पत्ति कैसे हुई?

राजपूतों की उत्पत्ति कैसे हुई? राजपूतों की उत्पत्ति के बारे में क्या विभिन्न मत है?

राजपूतों की उत्पत्ति के कई सिद्धांत है जिसको मुख्यतः दो भागों में बांटा जा सकता है। ये दो सिद्धांत है मूल भारतीय उत्पत्ति और विदेशी उत्पत्ति।

1.राजपूतों की उत्पत्ति का मूल भारतीय सिद्धांत

इस सिद्धांत के अनुसार राजपूतों को किसी भी विदेशी मूल से सम्बंधित नहीं किया जाता है. बल्कि उन्हें क्षत्रिय जाति से सम्बंधित किया जाता है।

गौरीशंकर हीराचन्द ओझा राजपूतों को सूर्यवंशीय और चन्द्रवंशीय बताते हैं। अपने मत की पुष्टि के लिए उन्होंने कई शिलालेखों और साहित्यिक ग्रंथों के प्रमाण दिये हैं, जिनके आधार पर उनकी मान्यता है कि राजपूत प्राचीन क्षत्रियों के वंशज हैं। इन विद्वानों के अनुसार राजपूत विशुद्ध भारतीय क्षत्रियों की ही संतान थे, जिनमें विदेशी रक्त का मिश्रण बिल्कुल भी नहीं था।ओझा ने राजपूतों को विशुद्ध क्षत्रिय सिद्ध करने के लिये मनुस्मृति से उदाहरण प्रस्तुत किया है। इसमें एक स्थान पर विवरण मिलता है, कि पौण्ड्रक, चोल,द्रविङ, यवन, शक, पारद, पहल्लव,  मूलतः क्षत्रिय थे, किन्तु वैदिक क्रियाओं के त्याग से तथा ब्राह्मणों से विमुख हो जाने के कारण उनका क्षत्रियत्व समाप्त हो गया। इससे स्पष्ट है कि शक-यवन जिन्हें राजपूतों का जनक बताया जाता है, क्षत्रिय ही थे। प्राचीन क्षत्रिय वर्ण के शासक तथा योद्धा वर्ग के लोग ही 12 वी. शता.में राजपूत कहे गये। राजपूतों की उत्पत्ति से सम्बन्धित यही मत सर्वाधिक लोकप्रिय है।

महाराणा प्रताप

2.राजपूतों की उत्पत्ति का विदेशी सिद्धान्त

विदेशी उत्पत्ति के समर्थकों में महत्त्वपूर्ण स्थान कर्नल जेम्स टॉड का है। वे राजपूतों को विदेशी सीथियन जाति की सन्तान मानते हैं। तर्क के समर्थन में टॉड ने दोनों जातियों (राजपूत एवं सीथियन) की सामाजिक एवं धार्मिक स्थिति की समानता की बात कही है। उनके अनुसार दोनों में रहन-सहन, वेश-भूषा की समानता, मांसाहार का प्रचलन, रथ के द्वारा युद्ध को संचालित करना, याज्ञिक अनुष्ठानों का प्रचलन, अस्त्र-शस्त्र की पूजा का प्रचलन आदि से यह प्रतीत होता है कि राजपूत सीथियन के ही वंशज थे।

स्मिथ के अनुसार उत्तर-पश्चिम की राजपूत जातियां  – प्रतिहार, चौहान, परमार, चालुक्य आदि की उत्पत्ति शकों तथा हूणों से हुयी  थी।  स्मिथ की धारणा है कि शक-कुषाण आदि विदेशी जातियों ने हिन्दू धर्म ग्रहण कर लिया। वे कालांतर में भारतीय समाज में पूर्णतया घुल-मिल गयी। उन्होंने यहाँ की संस्कृति को अपना लिया। इन विदेशी शासकों को भारतीय समाज में क्षत्रियत्व का पद प्रदान कर दिया गया।

डा.भंडारकर ने विदेशी उत्पत्ति का किया समर्थन

डा.भंडारकर ने भी विदेशी उत्पत्ति के मत का समर्थन किया है। उनके अनुसार अग्निकुल के चार राजपूत वंश – प्रतिहार, परमार, चौहान तथा सोलंकी – गुर्जर नामक विदेशी जाति से उत्पन्न हुये थे। चौहान तथा गुहिलोत जैसे कुछ वंश विदेशी जातियों के पुरोहित थे। उन्होंने आगे बताया है,कि गुर्जर-प्रतिहार वंश के लोग खजर नामक जाति की संतान थे, जो हूणों के साथ भारत में आयी थी।

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राजपूतों की उत्पत्ति के कुछ दूसरे  सिद्धांत

1.अग्निकुंड का सिद्धांत

पृथ्वीराज रासो के अनुसार राजपूतों की उत्पत्ति कैसे हुई?

इस मत का प्रथम सूत्रपात चन्दबरदाई के प्रसिद्ध ग्रंथ ‘पृथ्वीराजरासो’ से होता है। उन्होंने बताया कि माउंट आबू पर गुरु वशिष्ट का आश्रम था, गुरु वशिष्ठ जब यज्ञ करते थे तब कुछ दैत्यो द्वारा उस यज्ञ को असफल कर दिया जाता था!  तथा उस यज्ञ में अनावश्यक वस्तुओं को डाल दिया जाता था। जिसके कारण यज्ञ दूषित हो जाता था गुरु वशिष्ठ ने इस समस्या से निजात पाने के लिए अग्निकुंड अग्नि से 4 योद्धाओं को प्रकट किया  जिनके नाम थे प्रतिहार, परमार, चालुक्य और चौहान।

अग्निवंशी मत का खंडन

इतिहासकारों के अनुसार ‘अग्निवंशीय सिद्धान्त’ पर विश्वास करना उचित नहीं है गौरीशकंर हीराचन्द ओझा, सी.वी.वैद्य, दशरथ शर्मा, ईश्वरी प्रसाद इत्यादि इतिहासकारों ने इस मत को निराधार बताया है।

2 राजपूतों की ब्राह्मण उत्पत्ति का  सिद्धांत

डॉ. डी. आर. भण्डारकर ने बिजौलिया शिलालेख के आधार पर कुछ राजपूत वंशों को ब्राह्मणों से उत्पन्न माना है। वे चौहानों को वत्स गोत्रीय ब्राह्मण बताते हैं और गुहिल राजपूतों की उत्पत्ति नागर ब्राह्मणों से मानते हैं।

राजपूत काल

हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद से लेकर 12 वी. शता. तक का काल उत्तर भारत के इतिहास में सामान्यतः राजपूत-काल के नाम से जाना जाता है। 7वी., 8वी. शती से हमें राजपूतों का उदय दिखाई देने लगता है, तथा 12 वी. शती तक आते-आते उत्तर भारत में उनके 36 कुल अत्यंत प्रसिद्ध हो जाते हैं

राजपूत शब्द की उत्पत्ति

राजपूत शब्द संस्कृत के राजपुत्र का ही विस्तृत रूप है। राजपुत्र शब्द का प्रयोग, जो पहले राजकुमार के अर्थ में किया जाता था, पूर्व मध्यकाल में सैनिक वर्गों तथा छोटे-2 जमींदारों के लिये किया जाने लगा। 8 वी. शती.केबाद राजपूत शब्द शासक वर्ग का पर्याय बन जाता है।

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