Ranjeet Bhartiya 31/10/2022
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Last Updated on 31/10/2022 by Sarvan Kumar

भारत में 3,000 जातियाँ और 25,000 उपजातियाँ हैं, जिनमें से प्रत्येक एक विशिष्ट व्यवसाय से संबंधित हैं. चमार जाति समूह का पारंपरिक व्यवसाय चमड़े और चमड़े के सामानों का प्रसंस्करण, निर्माण और व्यापार रहा है. अपना सामाजिक प्रभुत्व स्थापित करना सामाजिक समूहों के बीच एक सामान्य प्रवृत्ति है. आइए इसी क्रम में जानते हैं चमारों को कैसे काबू में करें.

चमारों को कैसे काबू में करें.

इस लेख के विषय वस्तु को समझने के लिए हमें सामाजिक प्रभुत्व की अवधारणा और चमार समुदाय की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझना होगा. सामाजिक प्रभुत्व उन स्थितियों को संदर्भित करता है जिनमें “एक व्यक्ति या एक समूह मुख्य रूप से प्रतिस्पर्धी स्थितियों में दूसरों के व्यवहार को नियंत्रित या निर्देशित करता है”.सामाजिक प्रभुत्व अंतरसमूह संबंधों को तय करता है और इसके कई मनोवैज्ञानिक आयाम हैं. इससे सामाजिक पदानुक्रम तथा जाति आधारित विशेषताओं का निर्धारण भी होता है. सामाजिक प्रभुत्व समूह-आधारित असमानताओं के माध्यम से हासिल किया जाता है. मुख्य रूप से समूह-आधारित असमानताओं को तीन प्राथमिक तंत्रों के माध्यम से बनाए रखा जाता है: संस्थागत भेदभाव, समग्र व्यक्तिगत भेदभाव और व्यवहारिक विषमता. संस्थागत भेदभाव संस्थानों के भीतर पूर्वाग्रही प्रथाओं और नीतियों को संदर्भित करता है जिसके परिणामस्वरूप अधीनस्थ समूहों के सदस्यों को संसाधनों और अवसरों से व्यवस्थित रूप से वंचित किया जाता है. भेदभाव के इस रूप को किसी संस्था के कानूनों, संगठनात्मक दिशानिर्देशों या परंपराओं द्वारा बनाए रखा जाता है. समग्र व्यक्तिगत भेदभाव व्यक्तिगत भेदभाव के साधारण और छोटे कृत्यों का योग होता है. ‘व्यवहार विषमता’ प्रमुख और अधीनस्थ समूहों के बीच व्यवहार का वर्णन करने के लिए किया जाता है जो प्रमुख समूह के लिए दबंग स्थिति पैदा करता है, और कायम रखता है.चमार समुदाय के लोग ऐतिहासिक रूप से चमड़े के काम से जुड़े रहे हैं. इस व्यवसाय को अपवित्र माने जाने के कारण चमार समुदाय के लोगों को जातिगत भेदभाव और अस्पृश्यता के दंश झेलना पड़ा है. इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि इस समुदाय के लोगों को अतीत में संस्थागत भेदभाव, समग्र व्यक्तिगत भेदभाव और व्यवहारिक विषमता के माध्यम से समाज के तथाकथित उच्च वर्गों द्वारा अधिकारों और अवसरों से वंचित करके नियंत्रण या काबू में रखने का प्रयास किया गया है. बाद में अतीत की अछूत जातियों को दलितों के रूप में जाना जाने लगा और संवैधानिक प्रावधानों के तहत अनुसूचित जाति के रूप में वर्गीकृत किया गया. वर्तमान में चमार जाति समूह को भी अनुसूचित जाति के रूप में सूचीबद्ध किया गया है, जो भारत में सबसे वंचित सामाजिक-आर्थिक समूहों में से एक हैं. अनुसूचित जाति की स्थिति में सुधार के लिए संविधान एक त्रिस्तरीय रणनीति प्रदान करता है: सुरक्षात्मक व्यवस्था, सकारात्मक कदम तथा विकास और कल्याण की योजनाएं. इन सब के कारण चमार समुदाय के लोग पहले से ज्यादा सुरक्षित हैं, और इनके साथ जातीय उत्पीड़न के मामलों में काफी कमी आई है. सरकार द्वारा भेदभाव की स्थापित प्रथाओं समाप्त करके समुदायों के बीच सामाजिक आर्थिक अंतर को पाटने का लगातार प्रयास किया जा रहा है ताकि अनुसूचित जातियों को समाज की मुख्य धारा से जुड़ा जा सके. वर्तमान में चमार समुदाय के लोग आरक्षण व्यवस्था का लाभ उठाकर सरकारी सेवाओं में तथा शिक्षण संस्थानों में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करवा रहे हैं. इनमें से कई अब वर्तमान अवसरों का लाभ उठाकर आर्थिक और सामाजिक रूप से काफी मजबूत हुए हैं. उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में चमार समुदाय एक राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरा है. कुल मिलाकर चमार  समुदाय के लोग सशक्तिकरण के विभिन्न पैमानों पर काफी सशक्त हुए हैं. इसीलिए इन्हें अब उस तरह से काबू में नहीं किया जा सकता जैसा कि पहले होता था. इसलिए चमारों को काबू करने के लिए-

• धर्म, जाति, वंश, लिंग, जन्म स्थान एवं निवास आदि के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए और इनके साथ सम्मान पूर्वक व्यवहार किया जाना चाहिए.

•इनके साथ किसी प्रकार का जातीय उत्पीड़न नहीं होना चाहिए और अगर किसी प्रकार का उत्पीड़न होता है तो न्याय सुनिश्चित किया जाना चाहिए.

• इन्हें अवसरों से वंचित नहीं किया जाना चाहिए. इनके लिए शिक्षा और रोजगार के नए अवसरों को प्रदान किया जाना चाहिए.

• इनके विकास और सशक्तिकरण के लिए आर्थिक और शिक्षा संबंधी सुविधाएं प्रदान की जानी चाहिए.

• समाज के तथाकथित ऊंचे तबक़े को जातिवादी अहंकार त्याग, दलित विरोधी मानसिकता और जातीय पूर्वाग्रह त्याग कर को साथ लेकर चलने का प्रयास करना चाहिए ताकि समाज और देश आगे बढ़ सके.


References:

•”What is India’s caste system?”. BBC News. 19 June 2019.

•Sidanius, Pratto & Devereux 1992, p. 379.

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