Ranjeet Bhartiya 03/07/2022
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Last Updated on 19/07/2022 by Sarvan Kumar

“यदुवंशी जाट”- इस शब्द का उल्लेख कई पुस्तकों में किया गया है. इस शब्द को सुनकर आपके मन में कई तरह के प्रश्न आ रहे होंगे. जैसे, कौन हैं ये यदुवंशी जाट? क्या इनका भी संबंध यदुवंश से है? क्या यादवों और जाटों में किसी प्रकार का संबंध है? आइए इन सब प्रश्नों का उत्तर ढूंढने का प्रयास करते हैं-

यदुवंशी जाट

‘पांडव गाथा’ नामक पुस्तक में उल्लेख किया गया है कि “कृष्ण जन्मभूमि पर प्रथम मंदिर का निर्माण यदुवंशी जाट राजा ब्रजनाम ने ईसा पूर्व 80 में कराया था. कालक्रम में इस मंदिर के ध्वस्त होने के बाद गुप्त काल के जाट सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने सन 400 ईसवी में दूसरे वृहद मंदिर का निर्माण कराया. परंतु इस मंदिर को महमूद गजनवी ने ध्वस्त कर दिया. तत्पश्चात जाट महाराज विजयपाल देव के शासनकाल में जाट शासक जाजन सिंह ने तीसरे मंदिर का निर्माण करवाया. यह मंदिर भी 16 वीं सदी में सिकंदर लोधी द्वारा ध्वस्त कर दिया गया. सम्राट जहांगीर के शासनकाल में एक बार पुनः मंदिर का निर्माण कराया गया. इस मंदिर को भी मुगल शासक औरंगजेब ने सन 1669 में नष्ट कर दिया. फिर पुनः इसका निर्माण यहां के जाट शासक महाराज सूरजमल ने करवाया जिसका विस्तार महाराजा जवाहर सिंह ने किया था.”

जाटों का यादव होने के प्रमाण

यदुवंश भारत का एक प्राचीन समुदाय है. माना जाता है कि यदुवंश (यादव) की उत्पत्ति महान पौराणिक राजा यदु से हुई है. यह प्राचीन समुदाय विभिन्न कुलों से बना था, जिसमें प्रमुख थे- वृष्णि,अभुर, अंधक, सातवत और भोज. कभी मथुरा इन कुलों की राजधानी हुआ करती थी. वृष्णि चंद्रवंशी क्षत्रिय राजा यदु के वंशज थे. वृष्णि का जन्म ययाति के पुत्र यदु की 19वीं पीढ़ी में महाराजा मधु के ज्येष्ठ पुत्र के रूप में हुआ था. वृष्णि से हीं वृष्णि वंश चला. माना जाता है कि भगवान श्री कृष्ण वृष्णि कुल के थे. साहित्य और इतिहास में मौजूद निम्नलिखित तथ्य इस बात की तरफ संकेत करते हैं कि जाटों का संबंध यदुवंश/ भगवान कृष्ण से है-

प्रमाण-1- भरपुर वंश के पूर्वज श्रीकृष्ण वंश के यदुवंशी कुल के क्षत्रिय जाट

महाराजा सूरजमल (13 फरवरी 1707 – 25 दिसम्बर 1763) राजस्थान के भरतपुर के हिन्दू जाट राजा थे. इतिहासकार और सिविल सर्वेंट राम पांडे (Ram Pande) ने अपनी किताब “Bharatpur Upto 1826: A Social and Political History of the Jats” में भरतपुर के जाट राजाओं की उत्पत्ति और इनके पूर्वजों के बारे में विस्तार से लिखा है. राम पांडे के अनुसार, भरतपुर वंश के पूर्वज श्रीकृष्ण वंश के यदुवंशी कुल के क्षत्रिय जाट थे. सिनसिनवार जाटों का गोत्र है. इस गोत्र वाले जाटों का उद्गम भरतपुर जिले के सिनसिनी और उसके नजदीकी गांवों से माना जाता है. भरतपुर के जाट राजा सूरजमल भी सिनसिनवार गोत्र के जाट थे. सिनसिनवार गोत्र में जाटों के एक पूर्वज हुए जिनका नाम बृज राज था. उन्होंने अपने नाम पर बृज नामक क्षेत्र पर शासन किया. यह लोग द्वारका से लौटे थे और कई पीढ़ियों तक इनकी राजधानी मथुरा रही.

प्रमाण-2-ज्ञाति’ से ‘ज्ञात’ अन्ततोगत्वा ‘जाट’

कहा जाता है कि भगवान कृष्ण द्वारा कंस के वध के बाद उसका ससुर जरासंध आग बबूला हो गया. कृष्ण और बलराम को मारने के लिए उसने मथुरा पर 17 बार आक्रमण किया. लेकिन हर बार उसे पराजय का सामना करना पड़ा. जब जरासंध ने विशाल सेना के साथ मथुरा पर आक्रमण किया; और एक अन्य असुर कालयवन ने राक्षसों के 30 लाख सेना के साथ मथुरा को घेर लिया, तो श्री कृष्ण अंधक, वृष्णि, भोज आदि कुलों के साथ द्वारका चले गए. महाभारत के अध्याय 25, श्लोक 26 में उल्लेख किया गया है कि जरासंध और असुरों का मुकाबला करने के लिए भगवान कृष्ण ने अंधक और वृष्णि कुलों के एक संघ ‘गण-संघ’ की स्थापना की. इस संघ को ‘ज्ञाति-संघ’ (Gyati-sangh) के नाम से जाना जाता था. इस ‘ज्ञाति-संघ’ के प्रत्येक सदस्य को ‘ज्ञात’ के नाम से जाना जाता था. श्री कृष्ण इस संघ के प्रमुख थे. “जाट इतिहास” नामक पुस्तक के लेखक ठाकुर देशराज के अनुसार, समय के साथ ‘ज्ञाति’ ‘ज्ञात’ बन गया और और अन्ततोगत्वा यह ‘जाट’ में बदल गया. इस प्रकार यह दावा किया जाता है कि भगवान कृष्ण जाटों के वास्तविक पूर्वज और संस्थापक हैं.

प्रमाण-3- यादव से जादव-  जादव जाट

पं० लेखराम जी के अनुसार, यदु के वंशज अपने पूर्वज यदु के नाम पर यादव के रूप में जाने जाते हैं. कालांतर में यादव जादव में बदल गया, और जादव जाट शब्द में तब्दील हो गया.

प्रमाण-4-जाट यादवों के पूर्वज

अरब यात्री, फ़ारसी विद्वान और किताब-उल-हिन्द नामक प्रसिद्ध पुस्तक के लेखक, अल-बिरूनी (Al-Biruni) ने उल्लेख किया है कि जाट भगवान कृष्ण के वंशज हैं. मुस्लिम मुल्कों में यह धारणा है कि जाट यादवों के पूर्वज हैं.

प्रमाण-5

कारनामा-ए-राजपूत के लेखक नजमुल गनी ने लिखा है कि जाट समुदाय के लोग श्री कृष्ण के गौरवशाली वंशज हैं.

प्रमाण-6

ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के एक अधिकारी और एक ओरिएंटल विद्वान लेफ्टिनेंट-कर्नल  (20 मार्च 1782 – 18 नवंबर 1835) जेम्स टॉड ने भी लिखा है कि जाट कृष्ण के वंशज हैं.

प्रमाण-7

इंडोलॉजी के एक प्रसिद्ध विद्वान मिस्टर नेशफील्ड लिखते हैं कि जाट शब्द यदु या जदु के आधुनिक हिंदी उच्चारण से ज्यादा कुछ नहीं है, जिस जनजाति में कृष्ण का जन्म हुआ था.

प्रमाण-8

ठाकुर देशराज ने अपने किताब “जाट इतिहास” में उल्लेख किया है कि भरतपुर शासक चंद्रवंशी थे, जो एक शाखा वृष्णि वंश यदुवंशी थे जिसमें कृष्ण का जन्म हुआ था.

प्रमाण-9

राजा लक्ष्मण सिंह बुलंदशहर के संस्मरणों में लिखते हैं कि यह एक सत्यापित तथ्य है कि भरतपुर के जाट यादवों के वंशज हैं जिनमें कृष्ण का जन्म हुआ था.

जाटों और यादवों के बीच वर्तमान समानता

ऊपर हमने जाट और यादव समुदाय के बीच पौराणिक और ऐतिहासिक समानता के बारे में बताया है. एक नजर दोनों समुदायों के वर्तमान स्थिति पर डालते हैं. जाटों और यादवों के बीच आपको अनेक समानताएं मिल जाएंगी. दोनों ही कृषक जातियां हैं. दोनों को पशुपालक जाति माना जाता है. दोनों ही शारीरिक बनावट से हष्ट-पुष्ट, बलिष्ठ और मजबूत होते हैं. दोनों ही स्वभाव से निडर, गुस्सैल प्रवृत्ति के और लड़ाकू माने जाते हैं. जाट और और यादव भारी संख्या में सेना में भर्ती होते हैं और देश की रक्षा के लिए लड़ते हैं.


References;

(1). PANDAV GATHA: TOMAR JAT EMPERORS OF NORTH INDIA

By KanwarPal Singh

(2). Bharatpur Upto 1826: A Social and Political History of the Jats

By Ram Pande

(3). Parmesh Sharma & Rajpal Shastri: Kshatriyon ka Itihas

(4). Thakur Deshraj Jat Itihas (Hindi), Maharaja Suraj Mal Smarak Shiksha Sansthan, Delhi, 1934, 2nd edition 1992. Page 106-109

(5). Parmesh Sharma & Rajpal Shastri: Kshatriyon ka Itihas

(6). Nazmul Gani:Kārnām-e-Rājput

(7). James Todd: Annals and Antiquities of Rajasthan, 2 Vols., Routledge & Kegan Paul Ltd., London, 1972 (reprint), first published in 1829

(8). Dr. Prakash Chandra Chandawat: Maharaja Suraj Mal aur unka yug, Jaypal Agencies Agra, 1982

(9). UN Sharma :Jaton ka Navin Itihas

(10). Raja Laxman Singh: Memoirs of Bulandshahar

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