Sarvan Kumar 17/02/2023
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Last Updated on 17/02/2023 by Sarvan Kumar

22 dec. 1970 – 2 june 1971 तथा 24 june 1977 – 21 april 1979 के दौरान दो बार बिहार के मुख्यमंत्री पद पर रहे कर्पूरी ठाकुर का जन्म बिहार के समस्तीपुर जिले के पितौंझिया गांव , जिसे अब कर्पूरी ग्राम कहा जाता है, में नाई जाति में हुआ था. उनके पिताजी का नाम श्री गोकुल ठाकुर तथा माता जी का नाम श्रीमती रामदुलारी देवी था. बिहार की सियासत में जब भी सहज जीवन शैली और सर्वहारा की सियासत करने वाले मुख्यमंत्री की चर्चा होगी. रिक्शे से चलना, बेटी के वर के तलाश में टैक्सी से जाना, ऐसी कई प्रसंग है जिससे उनके सादा जीवन की पुष्टि होती है. कर्पूरी ठाकुर के मुख्यमंत्री रहते हुए ही बिहार अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए आरक्षण लागू करने वाला देश का पहला सूबा बना था.साधारण जीवनशैली वाले कर्पूरी ठाकुर का विचार काफी ऊंचे थे.आइए जानते है उनसे जुड़ी 10 रोचक जानकारी.

कर्पूरी ठाकुर विचार

1.कर्पूरी ठाकुर (24 जनवरी 1924 – 17 फरवरी 1988) के लोकप्रियता के कारण उन्हें जन-नायक कहा जाता था.

2.एक क्रांतिकारी भाषण में उन्होंने कहा था”हमारे देश की आबादी इतनी अधिक है कि केवल थूक फेंक देने से अंग्रेजी राज बह जाएगा”

3.कर्पूरी ठाकुर का चिर परिचित नारा था.. “अधिकार चाहो तो लड़ना सीखो पग पग पर अड़ना सीखो जीना है तो मरना सीखो”

4 कर्पूरी ठाकुर जब राज्य के मुख्यमंत्री थे तो उनके रिश्ते में उनके बहनोई उनके पास नौकरी के लिए गए और कहीं सिफारिश से नौकरी लगवाने के लिए कहा। उनकी बात सुनकर कर्पूरी ठाकुर गंभीर हो गए। उसके बाद अपनी जेब से पचास रुपये निकालकर उन्हें दिए और कहा, “जाइए, उस्तरा आदि ख़रीद लीजिए और अपना पुश्तैनी धंधा आरंभ कीजिए।” इस घटना से ये पता चलता है कि वे राजनीति में किसी पद पर रहते हुए भ्रष्टाचार के कितने विरोधी थे.

5. आज लोग MLA, MP रहते हुए अरबों का घोटाला कर बेहिसाब धन -संपदा अर्जित कर लेते हैं वही कर्पूरी ठाकुर दो बार मुख्यमंत्री पद और एक बार उपमुख्यमंत्री रहते हुए भी अपने परिवार के लिए कुछ भी नहीं जोड़ा. जब वो मरे तो अपने परिवार को विरासत में देने के लिए एक मकान तक उनके नाम नहीं था। ना तो पटना में, ना ही अपने पैतृक घर में वो एक इंच जमीन जोड़ पाए.

6.कर्पूरी ठाकुर के पुत्र रामनाथ ठाकुर इन दिनों भले राजनीति में हों और पिता के नाम का लाभ भी उन्हें मिला हो, लेकिन कर्पूरी ठाकुर ने अपने जीवन में उन्हें राजनीतिक तौर पर आगे बढ़ाने का काम नहीं किया.

7. जब उन्होंने हाशिये पर धकेल दिये वर्ग के लिए सरकारी नौकरियों में 26 प्रतिशत आरक्षण लागू किया तो उन्हें क्या-क्या न कहा गया. लोग उनकी मां-बहन-बेटी-बहू का नाम लेकर भद्दी गालियां देते अभिजात्य वर्ग के लोग उन पर तंज कसते हुए कहते – कर कर्पूरी कर पूरा, छोड़ गद्दी, धर उस्तरा.

8.उनकी पत्नी का श्राद्धकर्म रेलवे प्लेटफार्म पर आयोजित किया गया. प्लेटफार्म पर ही सभी बड़े-छोटे राजनीतिज्ञों ने श्राद्धकर्म में भाग लिया. ऐसा इसलिए हुआ कि उनका घर इतना छोटा था कि वहां बहुत ही कम जगह थी.

9.वे मैट्रिक में फर्स्ट डिविज़न से पास हुए थे. नाई का काम कर रहे उनके बाबूजी उन्हें गांव के समृद्ध वर्ग के एक व्यक्ति के पास लेकर गए और कहा, ‘सरकार, ये मेरा बेटा है, फर्स्ट डिविजन से पास किया है.’ उस आदमी ने अपनी टांगें टेबल के ऊपर रखते हुए कहा, ‘अच्छा, फर्स्ट डिविज़न से पास किए हो? मेरा पैर दबाओ. इस घटना से ये पता चलता है कि पढ़ लिख जाने और अच्छी नौकरी के बावजूद सामंती लोग वंचित वर्ग के सम्मान देने लायक नहीं समझते थे.

10. कर्पूरी ठाकुर का निधन 64 साल की उम्र में 17 फरवरी, 1988 को दिल का दौरा पड़ने से हुआ था.

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