Sarvan Kumar 22/11/2021
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Last Updated on 01/12/2021 by Sarvan Kumar

भूमिहार शब्द के शाब्दिक अर्थ से इनके उत्पत्ति के  बारे में अनुमान लगाए जाते रहे हैं। भूमिहार दो शब्दों के मेल से बना हुआ है एक है भूमि और दूसरा हार ,अर्थात भूमि + हार = भूमिहार। भूमि का अर्थ तो सबको पता है भूमि का मतलब है जमीन, हार का अलग-अलग अर्थ निकाले जाते रहे हैं।आइए जानते हैं भूमिहार शब्द की उत्पति कैसे हुई?

भूमिहार शब्द का पहला अर्थ

भूमिहार का अर्थ होता है “भूमिपति” , “भूमिवाला” या भूमि से आहार अर्जित करने वाला (कृषक) । कृषक होने के कारण इनको, जाति में निचले स्तर का होने का भी बता दिया जाता है। कुछ लोगों का कहना है कि ब्राह्मण खेती तो नहीं करते अतः इन्हें ब्राह्मण कहना सही नहीं रहेगा। कुछ लोग तो यहां तक कह देते हैं कि यह एक हाइब्रिड जाती है । ब्राह्मण या राजपूत पिता और किसी दूसरे जाति के माता से इनका जन्म हुआ है, पर ऐसा कहना बिल्कुल गलत है। जानकारी नहीं होने के कारण इन्हें यह कह कर अपमानित किया जाता रहा है। भ्रमित होकर ब्रिटिश ने भारत के कुछ शुरुआती जनगणना में भूमिहारों को शूद्रों के रूप में वर्गीकृत किया, जो चार वर्णों में सबसे नीचे थे।

स्वामी सहजानंद सरस्वती की पुस्तक जरुर पढें

भूमिहार शब्द का दूसरा अर्थ

भूमिहार शब्द का अर्थ संस्कृत व्याकरण के अनुसार भूमि हरने वाला या छीनने वाला है या भूमि को हार (माला) के समान गले लगाने वाला है। इन दोनो ही अर्थ के अनुसार वे वास्तव में भूमि के बड़े प्रेमी है जमीन की प्राप्ति या रक्षा के लिए कुछ भी करने को तैयार है। स्वामी सहजानंद सरस्वती अपनी किताब ब्रह्मर्षि वंश विस्तर में लिखते हैं कि भूमिहार और जमींदार एक ही शब्द है। भूमिहार शब्द ‘भूमि’ शब्द को पूर्व में रखकर हृर हरणे धातु से ‘कर्मण्यण्’ (पा. 3। 2। 1) इस पाणिनिसूत्रानुसार ‘अण्’ प्रत्यय लगाने पर ‘भारहार’ आदि शब्दों की तरह बना हैं। यह हृ×र धातु हरण रूप अर्थ का बोधक हैं। जिस हरण का अर्थ पण्डित प्रवर भट्टोजिदीक्षित ने स्वकृत सिद्धान्त कौमुदी के उत्तारार्ध्द के भ्वादि गण में इसी हृ×र धातु के प्रकरण में लिखा हैं कि ‘हरणं प्रापणं, स्वीकार:, स्तेयं, नाशनं च।’ जिसका तात्पर्य यह हैं कि जिस हरण रूप अर्थ का वाचक ‘हृ’ धातु हैं, उस हरण के चार अर्थ हैं-(1) प्राप्त करना अर्थात् पहुँचाना, (2) स्वीकार करना, (3) चुराना, और (4) नाश करना। 
सहजानंद सरस्वती लिखते हैं कि परन्तु जब कि रुपये, पैसे इत्यादि की तरह पृथ्वी की चोरी या नाश हो नहीं सकता, इसलिए प्रकृत में हृ धातु के दो ही अर्थ हो सकते हैं, प्रापण अर्थात् पहुँचाना या बल से अधिकार कर लेना और स्वीकार।सरस्वती आगे लिखते हैं कि भूमिहार का अर्थ है ‘भूमि हरति प्रापयपि बलादधिकरोति केनचिदुपायेन स्वीकरोति वेति भूमिहार: जो ब्राह्मण पृथ्वी के ऊपर अस्त्र, शस्त्रादि के बल से अधिकार कर ले, अथवा उपयान्तर से प्राप्त पृथ्वी का स्वीकार कर ले वही भूमिहार है।

भूमिहार शब्द का तीसरा अर्थ

भूम्या भूमेर्वा हारो भूमिहार:

मदारपुर का युद्ध से भूमिहार  का अर्थ निकाला गया।मदारपुर नामक स्थान, जो कानपुर शहर के समीप है, मदारपुर के अधिपति भूमिहार ब्राह्मणों और बाबर की सेनाओं के बीच 1528 में युद्ध हुआ था जिसमें बाबर की सेना विजयी रही। माना जाता है कि मदारपुर के यही ब्राह्मण जब भूमि हार गए तब भूमिहार कहलाए। सहजानंद सरस्वती का कहना है अगर यह सिद्धांत सही होता तो मदारपुर के युद्ध से पहले से  ही वे भूमिहार नहीं कहलाते जबकि, वह तो युद्ध के पहले से ही भूमिहार कहलाते आ रहे थे।

भूमिहार शब्द पहली बार अस्तित्व में कब आया

भूमिपति ब्राह्मणों के लिए पहले जमींदार ब्राह्मण शब्द का प्रयोग होता था। याचक ब्राह्मणों के एक दल  ने विचार किया की जमींदार तो सभी जातियों को कह सकते हैं, फिर हममें और जमीन वाली जातियों में क्या फर्क रह जाएगा. काफी विचार विमर्श के बाद ” भूमिहार ” शब्द अस्तित्व में आया।

1.भूमिहार शब्द का प्रचलन या प्रयोग सबसे पहले 1526 ई० में बृहतकान्यकुब्जवंशावली में किया गया है। कान्यकुब्ज ब्राह्मण के निम्नलिखित पांच प्रभेद हैं:-
(1) प्रधान कान्यकुब्ज (2) सनाढ्य (3) सरवरिया (4) जिझौतिया (5) भूमिहार

2. पहले गैर सरकारी रूप में इतिहासकार बुकानन ने
1807 में पूर्णिया जिले की सर्वे रिपोर्ट में किया है।
इनमे लिखा है :- “भूमिहार अर्थात अयाचक ब्राह्मण एक ऐसी सवर्ण जाति जो अपने शौर्य, पराक्रम एवं बुद्धिमत्ता के लिये जानी जाती है। इसका गढ़ बिहार एवं पूर्वी उत्तर प्रदेश है.

2.भूमिहार शब्द का सरकारी अभिलेखों में प्रथम प्रयोग 1865 की जनगणना रिपोर्ट में हुआ है।

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