Ranjeet Bhartiya 07/11/2021
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Last Updated on 24/04/2022 by Sarvan Kumar

पासी उत्तर भारत में पाई जाने वाली एक जाति है. परंपरागत रूप से यह ताड़ी निकालने और बेचने का काम करते हैं. बता दें कि ताड़ी (Palm wine) एक मादक पेय है जो ताड़ की विभिन्न प्रजाति के वृक्षों के रस से निकाला जाता है. इनका पारंपरिक व्यवसाय सूअर पालना भी था. इन्हें ताड़माली के नाम से भी जाना जाता है. विभिन्न राज्यों में इन्हें अलग-अलग नामों से जाना जाता है, जैसे-राजपासी, बौरासी, गुज्जर, रावत, सरोज, कैथवास, भर, मोठी, बावरिया आदि. यह हिंदू और बौद्ध धर्म को मानते हैं. वर्तमान में काफी हद तक यह जाति एक व्यवसायिक जाति है, और स्थिति में भर, अरख, खटीक आदि जातियों से जुड़ी हुई है. लेकिन ऐतिहासिक तथ्यों से प्रतीत होता है कि अवध क्षेत्र में इनका काफी  महत्व रहा  है. आइए  जानते हैं पासी समाज  का इतिहास, पासी शब्द की उत्पति कैैैसे हुई?

पासी किस कैटेगरी में आते हैं?

उत्तर भारत के अधिकांश राज्यों में इन्हें आरक्षण व्यवस्था के अंतर्गत अनुसूचित जाति (scheduled caste) वर्ग में शामिल किया गया है. आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में इन्हें अन्य पिछड़ी जाति (OBC) का दर्जा प्राप्त है.

पासी की जनसंख्या, कहां पाए जाते हैं?

यह मुख्य रूप से बिहार और उत्तर प्रदेश में पाए जाते हैं. महाराष्ट्र, उत्तराखंड, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और अरुणाचल प्रदेश में भी इनकी आबादी है. राजपासी मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के अवध क्षेत्र में निवास करते हैं. 2001 की जनगणना में, पासी को उत्तर प्रदेश राज्य में दूसरे सबसे बड़े दलित समूह के रूप में दर्ज किया गया था. उस समय, यह राज्य की दलित आबादी का 16% थे और मुख्य रूप से अवध क्षेत्र में निवास करते थे. 2011 की जनगणना में उत्तर प्रदेश में इनकी जनसंख्या 65,22,166 दर्ज की गई थी. इस आंकड़े में ताड़माली भी शामिल थे.

पासी की उपजातियां

यह गुजर पासी, कैथवास और बोरिया में विभाजित हैं.

पासी शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई?

विलियम क्रुक के अनुसार, पासी शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के शब्द पाशिका से हुई है. पाशिका का अर्थ होता है- फंदा. इसी फंदे के सहारे पासी ताड़ और खजूर के पेड़ पर चढ़ते हैं और ताड़ी निकालने का काम करते हैं.

पासी जाति का इतिहास 

विलियम क्रुक का कहना है कि-“पासी जाति की परंपराओं के अनुसार, अवध क्षेत्र में इनका शासन था. इनके राजा खीरी, हरदोई और उन्नाव जिलों पर शासन करते थे. रामकोट, जहां अब उन्नाव का बांगरमऊ शहर स्थित है, इनके प्रमुख गढ़ों में से एक माना जाता है. रामकोट के अंतिम पासी शासक राजा संथार ने कन्नौज के प्रति अपनी निष्ठा को त्याग कर दिया और श्रद्धांजलि देने से इनकार कर दिया. इससे नाराज होकर राजा जयचंद ने अपने सेना नायकों अल्लाह और उदल को भेजा, जिन्होंने हमला करके रामकोट को नष्ट कर दिया और इसे आकारहीन खंडहरों में तब्दील कर दिया. इतिहासकार रामनारायण रावत के अनुसार, किसान सभा आंदोलनों में पासी समुदाय की भूमिका को पहले के इतिहासकारों ने कम करके आंका है. उनके अनुसार, इन आंदोलनों में पासी और चमार जाति की भूमिका महत्वपूर्ण थी. इन्हें केवल सुअर पालक के रूप में चित्रित करना ठीक नहीं है. जमीन के मालिक होने के कारण यह स्वर्ण समूहों के भांति हीं किसानों से संबंधित मुद्दों के लिए चिंतित थे.

पासी जाति की उत्पत्ति

पहली माान्यता:

जाति की उत्पत्ति के विषय में अनेक मान्यताएं हैं. एक मान्यता के अनुसार, यह दावा करते हैं कि इनकी उत्पत्ति भगवान विष्णु के अवतार परशुराम के पसीने से हुई है. मिर्जापुर और मध्य भारत में पासियों में प्रचलित मान्यता के अनुसार, एक दिन एक आदमी गायों को मारने जा रहा था. उस समय भगवान परशुराम जंगल में तपस्या कर रहे थे. पवित्र पशुओं के रोने की आवाज सुनकर वह उनकी सहायता के लिए दौड़े. लेकिन गौ हत्यारे की मदद उसके साथी कर रहे थे. यह देख कर भगवान परशुराम ने कुशा घास से 5 लोगों को उत्पन्न किया और उन पर अपने पसीने की बूंदों को डालकर प्राण डाल दिए. इसीलिए पसीने से उत्पन्न होने के कारण इनका नाम पासी पड़ा. इस प्रकार उत्पन्न गए किए गए पुरुषों ने गायों की रक्षा की. फिर वह भगवान परशुराम के पास वापस लौट आए और उनसे उन्हें एक पत्नी प्रदान करने के लिए कहा. उसी समय वहां से एक कायस्थ कन्या गुजर रही थी, परशुराम ने कायस्थ कन्या को पासियों को सौंप दिया. उनसे कैथवास उपजाति उत्पन्न हुई. पासी जाति की उत्पत्ति का यह दावा पासी समाज के लिए क्षत्रियत्व का मार्ग प्रशस्त करता है.

दूसरी मान्यता : विलियम क्रुक पासियों के उत्पत्ति से संबंधित एक अन्य किवदंती का उल्लेख किया है. इस मान्यता के अनुसार, भगवान परशुराम के समय कुफल नाम का एक तपस्वी भक्त था. उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ब्रह्मा ने वरदान मांगने को कहा. कुफल ने ब्रह्मा जी से चोरी की कला में सिद्धि का वरदान मांगा. इस मान्यता के अनुसार पासी जाति कुफल के ही वंशज हैं.

तीसरी मान्यता : इसी तरह से अवध क्षेत्र में के अन्य हिस्सों में एक मान्यता प्रचलित है. इसके अनुसार, राज पासी; जो इस जाति का सर्वोच्च विभाजन है; बैस राजपूतों के नायक तिलोकचंद के वंशज होने का दावा करते हैं.

पासी जाति के प्रमुख व्यक्ति

इस जाति के कुछ उल्लेखनीय व्यक्तियों के नाम हैं-बिजली पासी, सुहेलदेव, गंगाबक्स रावत, अमन राजपीयू, ऊदा देवी, मदारी पासी, आदि.

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