Ranjeet Bhartiya 03/11/2021
जाट गायक सिद्धू मूसेवाला आज हमारे बीच नहीं है पर उनकी याद हमारे दिलों में हमेशा बनी रहेगी। अपने गानों के माध्यम से वह अमर हो गए हैं । सिद्धू मूसेवाला की 29 मई को मानसा जिले में उनके घर से कुछ किलोमीटर दूर ही गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. हत्या किसने और किस वजह से की यह तो जांच के बाद ही पता चल पाएगा लेकिन हमने जाट समाज का एक अनमोल रत्न खो दिया है। उनके फैंस पर गमों का पहाड़ टूट पड़ा है। jankaritoday.com की टीम के तरफ से उनको एक सच्ची श्रद्धांजलि! Jankaritoday.com अब Google News पर। अपनेे जाति के ताजा अपडेट के लिए Subscribe करेेेेेेेेेेेें।
 

Last Updated on 03/11/2021 by Sarvan Kumar

पटवा हिंदी बेल्ट में निवास करने वाली एक हिंदू जाति है. यह परंपरागत रूप से बुनकरों की एक व्यवसायिक जाति है. रेशम के लटो और और धागे से हथकरघा (handloom) गमछा, चादर, बेडशीट आदि बनाना इनका मुख्य पेशा रहा है. यह पारंपरिक रूप से मोतियों में धागे पिरोने तथा सोने और चांदी के धागों को बांधने के कार्य से जुड़े रहे हैं.वर्तमान में यह महिलाओं के श्रृंगार के सामान, झूमके, हार और सौंदर्य प्रसाधन बेचने का काम करते हैं. यह घरों में प्रयोग किए जाने वाले छोटे-मोटे सामानों तथा ताड़ से बने हाथ के पंखे भी बेचते हैं. बदलते वक्त के साथ उन्होंने हैंडलूम के जगह पावर लूम का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है. साथ ही इन्होंने अन्य व्यवसायों में भी विस्तार किया है. आइए जानते हैं पटवा समाज का इतिहास, पटवा शब्द की उत्पति कैसे हुई?

IIT village of India Patwa Toli

बिहार में अत्यंत पिछड़ी जाति के अंतर्गत आने वाला पटवा समाज शिक्षा के प्रसार के कारण अन्य जातियों के लिए प्रेरणा स्रोत बन गया है. यहां यह समाज बड़ी संख्या में IIT इंजीनियर को पैदा करने के लिए जाना जाता है. बेहद कम आबादी वाला यह समाज साल 1996 से लेकर अब तक 400 से ज्यादा IIT इंजीनियरों को पैदा कर चुका है. पटवाटोली, गया जिले के मानपुर ब्लॉक में एक इलाका है, जो भारत के बिहार में परंपरागत रूप से बुनकरों के लिए जाना जाता है, लेकिन अब IIT village of India के नाम से मशहूर है. इलाके में 1,000 घरों में कम से कम एक इंजीनियर है

पटवा जाति की जनसंख्या , कहां पाए जाते हैं?

यह पूरे भारत में पाए जाते हैं. लेकिन मुख्य रूप से हिंदी भाषी राज्यों जैसे बिहार, छत्तीसगढ़, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, चंडीगढ़ और दिल्ली में पाए जाते हैं.‌ यह महाराष्ट्र और गोवा में भी निवास करते हैं. बिहार में यह मुख्य रूप से नालंदा, गया, भागलपुर, नवादा और पटना जिलों में पाए जाते हैं.

पटवा की उपजातियां

काम के आधार पर इनकी प्रमुख उपजातियां हैं- नरैना; कनौजिया, जो शादी के कपड़े सिलते हैं; देववंशी, जो लाख और कांच की चूड़ियां बेजते हैं; लखेरा, जो लाख की चूड़ियां बनाने और बेचने का काम करते हैं; कचेरा, जो कांच की चूड़ियां बनाने का काम करते हैं. लाख का काम करने के कारण, मध्य भारत के कई इलाकों में पटवा और लखेरा को एक ही जाति के रूप में देखा जाता है.

पटवा किस धर्म को मानते हैं?

यह हिंदू समुदाय हैं. यह देवी भगवती और जगदंबा समेत अन्य हिंदू देवी देवताओं की पूजा करते हैं.

पटवा शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई?

इनकी परंपराओं के अनुसार, पट यानी धागा से कपड़ा और पोशाक बनाने के कारण इनका नाम पटवा पड़ा. इसी तरह से लाख (लाह) का काम करने वाले लखेरा कहलाए. पट एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ होता है- बुना हुआ कपड़ा.

पटवा जाति का इतिहास

कहा जाता है कि अकबर के नवरत्नों में से एक राजा मानसिंह ने पटवा को राजस्थान से स्थानांतरित करके,
बिहार के गया जिले में फल्गु नदी के तट पर स्थित, विष्णुपद मंदिर के दूसरी ओर बसाया था. हिंदू पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, पिंडदान पूजा के समय कपड़े का एक टुकड़ा देना अनिवार्य है. इसी मांग को पूरा करने के लिए राजा मानसिंह ने पटवा को गया में बसाया था. गया में पटवा समुदाय की एक कॉलोनी है, जिसे राजा मान सिंह के सम्मान में मानपुर कहा जाता है. यहां आज भी सूती के कपड़े बनाए जाते हैं.

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