Sarvan Kumar 07/11/2021

रौतिया भारत में निवास करने वाली एक जाति है. इन्हें राऊत के नाम से भी जाना जाता है. यह परंपरागत रूप से कृषक रहे हैं और खेती-बाड़ी इनका मुख्य पेशा है. यह आसपास के जंगलों से फल और कंद एकत्रित करते हैं. रोजी-रोटी की तलाश में अब इन्होंने शहरों की ओर रुख करना भी शुरू कर दिया है. रौतिया समाज की संस्कृति और परंपराएं समृद्ध हैं. यह मुख्य रूप से झारखंड, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा में पाए जाते हैं. यह हिंदू धर्म का अनुसरण करते हैं. कर्म जितिया, नवा खानी और दिवाली इन के पारंपरिक त्यौहार हैं. पेनकी, झूमर, डोमचक और फगुआ इनके पारंपरिक नृत्य हैं. आइए जानते हैैं रौतिया समाज का इतिहास,  रौतिया शब्द  की उत्पति कैैैसे हुई?

रौतिया किस कैटेगरी में आते हैं?

इस जाति को झारखंड, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के रूप में वर्गीकृत किया गया है. साल 2016 में, डॉ रामदयाल मुंडा ट्राईबल रिसर्च इंस्टीट्यूट ने रौतिया जाति को अनुसूचित जनजाति (schedule tribe) की सूची में शामिल करने की सिफारिश की थी.

रौतिया समाज की उप-जातियां

रौतिया समाज तीन उप समूहों में विभाजित है- बड़गोहरी (शुद्ध रौतिया), मझगोहरी और छोटी गोहरी. बड़गोहरी खुद को दूसरों से श्रेष्ठ मानते हैं. ऐसी मान्यता है कि मझली और छोटकी रौतिया पिता और अन्य जातियों की माता के वंशज हैं. उप समूह विभिन्न वर्गों में विभाजित हैं. इनके प्रमुख वंश हैं- लाथुर, खरकवार, खोया, रीखी, माझी, जोगी, बघेल, नाग, कटवार आदि इनके प्रमुख उपनाम हैं- गंझू, बारैक, कोटवार, साय और सिंह.

रौतिया  शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई?

रौतिया शब्द की उत्पत्ति “रावत” से हुई है, जिसका अर्थ होता है-“राजकुमार”, यह राजाओं के रिश्तेदारों द्वारा प्रयोग की जाने वाली उपाधि है. परंपराओं के अनुसार, इनके पूर्वजों ने राजपूत राजकुमार की मदद की थी और उनकी जान बचाई थी. इस बात से प्रसन्न होकर उन्हें उपहार के रूप में लोहरदगा और जशपुर में जमीन दी गई थी. इनके प्रमुख सैन्य सेवाओं की शर्त पर छोटा नागपुर के नागवंशी राजा के संपत्ति के मालिक थे.

रौतिया समाज का इतिहास

दक्षिणी छोटानागपुर प्रमंडल के जिले में निवास करने वाले रौतिया जाति के लोग पलामू के आदिवासी राजा चेरो राजवंश का वंशज होने का दावा करते हैं. 500 साल पहले पलामू में चेरो राजवंश में राजा महरथा का शासन था. कहा जाता है कि छोटानागपुर क्षेत्र में रहने वाले रौतिया समाज के लोग चेरो राजा के सैनिक थे. पलामू में उन्हें चेरो और इस क्षेत्र में रौतिया समाज के रूप में जाना जाता है. सरकारी दस्तावेजों में चेरो को आदिवासी, जबकि रौतिया को पिछड़ी जाति के रूप में मान्यता दी गई है . लेकिन ऐतिहासिक दस्तावेज, जातीय रीति रिवाज और शोध संस्थान से आदिवासियों के रहन-सहन से संबंधित दस्तावेजों से प्रतीत होता है कि रौतिया समाज और चेरो समाज एक ही है. होली के अवसर पर चेरो समाज के लोग एक रोटी का 26 टुकड़ा कर जिस देवता की पूजा करते हैं, रौतिया जाति में भी उसी देवता की पूजा करने की परंपरा है.

रौतिया समाज पर शोध कर रहे रवींद्र सिंह चेरो का कहना है कि रौतिया समाज का खुटकटी, बैगा पहनई एवं अन्य सभी परंपरा चेरोवंश से मिलता है. सरकारी दस्तावेजों में रांची जिला में चेरो जनजाति के होने की बात स्वीकार की गई है रांची में चेरो जनजाति रौतिया समाज ही है. यह बात सरकार तक पहुंचाई जाएगी और रौतिया समाज को आदिवासी समाज में शामिल कराया जाएगा.

रौतिया समाज  के प्रमुख व्यक्ति

जागीरदार बख्तर साय और मुंडल सिंह स्वतंत्रता सेनानी थे. उन्होंने 1812 में अत्यधिक कर लगाने के खिलाफ ईस्ट इंडिया कंपनी के विरुद्ध विद्रोह किया था. उन्होंने टैक्स कलेक्टर को मार डाला और ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना को हराया था. बाद में इन्हें गिरफ्तार करके 4 अप्रैल 2012 को कोलकाता में फांसी पर लटका दिया गया था.

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