Sarvan Kumar 07/11/2021
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Last Updated on 30/05/2024 by Sarvan Kumar

देशके लिए प्राण न्योछावर करने वाले कभी नहीं मरते हैं। उन्हें युगों-युगों तक याद किया जाता है। ऐसे ही वीर शहीदों में रायडीह प्रखंड के बख्तर साय और मुंडल सिंह के नाम अग्रणी हैं। इसकी वीरता की कहानी आज भी झारखंड छत्तीसगढ़ राज्य के लोगों की जुबानी है। दोनों ने जिस बहादुरी के साथ अंग्रेजों के छक्के छुड़ाए थे। वह इस क्षेत्र के लिए गर्व की बात है। बख्तर साय नवागढ़ परगना (वर्तमान में रायडीह) के जमींदार थे। उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी से लोहा लेकर उन्हें पराजय का स्वाद चखाया। पराजय के बाद अंग्रेजों ने कुटनीति चाल के तहत छोटानागपुर के महाराजा इंद्रनाथ शहदेव से संधी कर ली। इसके बाद अंग्रेज गरीबों से 12 हजार रुपए टैक्स की वसूली करने लगे। अंग्रेज टैक्स की वसूली के लिए लोगों पर जुल्म ढाने लगे। अंग्रेजों के जुल्म से जमींदार रैयत बिचलित हो उठे। संधी के बाद महाराजा इंद्रनाथ शाहदेव ने हीरा राम को टैक्स वसूली के लिए नवागढ़ भेजा। अंग्रेजों के जुल्म से आक्रोशित बख्तर साय ने हीरा राम का सिर कटवा कर थाली में सजाकर महाराजा इंद्रनाथ को भेजवा दिया। महाराजा ने इसकी जानकारी ईस्ट इंडिया कंपनी को दी। इसके बाद 11 फरवरी 1812 को रामगढ़ के मजिस्ट्रेट ने लैप्टिनेंट डोनेल के नेतृत्व में हजारीबाग के सैन्य टुकड़ी नवागढ़ के जमींदार बख्तर साय को पकड़ने के लिए भेजा। इसी बीच रामगढ़ बटालियन के कमांडेट आर मार्ट ने छोटानागपुर के बरवे क्षेत्र, जशपुर ओर सरगुजा के राजा को पकड़ने के लिए एक पत्र लिखा। साथ ही पूरे क्षेत्र की नाकाबंदी करने के लिए मदद मांगी। जशपुर राजा के साथ आर मार्ट का अच्छा संबंध था। इसका फायदा उठाते हुए लैप्टिनेंट डोनेल ने हजारों सैनिकों के साथ मिलकर नवागढ़ को घेर लिया। अंग्रोजों के मंसूबे की जानकारी पनारी के जमींदार मुंडल सिंह को हो गई। वे बख्तर साय का सहयोग करने के लिए नवागढ़ पहुंच गए। दोनों ने मिलकर अंग्रेजों से लोहा लिया। नवागढ़ के आसपास घना जंगल था। उंचे-उंचे पहाड़ थे। बख्तर साय मुंडल सिंह क्षेत्र की वस्तु स्थिति से अवगत थे। वहीं अंग्रेजों को मुंडल , बख्तर तक पहुंचने में परेशानी होने लगी। अंग्रेजों ने एक विशेष रणनीति के साथ नवागढ़ को चारों ओर से घेर लिया। बख्तर मुंडल एक गुफा में प्रवेश कर चले गए। अंग्रेजों को जब इसकी जानकारी हुई, तो उसने गुफा तक जाने वाली नदी के पानी की धारा को बंद कर दिया। जिससे बख्तर मुंडल अपने सैनिकों के साथ नदी का पानी नहीं पी सके। अंग्रेजों की इस कुटनीतिक चाल के बाद बख्तर मुंडल जशुपर के राजा इंद्रजीत सिंह के पास गए। वहां से दूसरे स्थान पर निकलने के कारण 23 मार्च 1812 को दोनों पकड़े गए। चार अप्रैल 1812 को दोनों को कोलकाता के फोर्ट विलियम स्थान पर ले जाकर फांसी दे दी गई। परंतु उनकी शहादत आज भी इस क्षेत्र के वादियों में गुंज रही है। हर वर्ष दोनों की याद में रायडीह पालकोट में शहादत दिवस कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है। रौतिया समाज देश के लिए उनके बलिदान को कभी भूला नहीं सकता। रौतिया जाति की पहचान शहीद बख्तर साय और मुंडल सिंह रहे हैं।

रौतिया भारत में निवास करने वाली एक जाति है. इन्हें राऊत के नाम से भी जाना जाता है. यह परंपरागत रूप से कृषक रहे हैं और खेती-बाड़ी इनका मुख्य पेशा है. यह आसपास के जंगलों से फल और कंद एकत्रित करते हैं. रोजी-रोटी की तलाश में अब इन्होंने शहरों की ओर रुख करना भी शुरू कर दिया है. रौतिया समाज की संस्कृति और परंपराएं समृद्ध हैं. यह मुख्य रूप से झारखंड, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा में पाए जाते हैं. यह हिंदू धर्म का अनुसरण करते हैं. कर्म जितिया, नवा खानी और दिवाली इन के पारंपरिक त्यौहार हैं. पेनकी, झूमर, डोमचक और फगुआ इनके पारंपरिक नृत्य हैं. आइए जानते हैैं रौतिया समाज का इतिहास,  रौतिया शब्द  की उत्पति कैैैसे हुई?

रौतिया किस कैटेगरी में आते हैं?

इस जाति को झारखंड, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के रूप में वर्गीकृत किया गया है. साल 2016 में, डॉ रामदयाल मुंडा ट्राईबल रिसर्च इंस्टीट्यूट ने रौतिया जाति को अनुसूचित जनजाति (schedule tribe) की सूची में शामिल करने की सिफारिश की थी.

रौतिया समाज की उप-जातियां

रौतिया समाज तीन उप समूहों में विभाजित है- बड़गोहरी (शुद्ध रौतिया), मझगोहरी और छोटी गोहरी. बड़गोहरी खुद को दूसरों से श्रेष्ठ मानते हैं. ऐसी मान्यता है कि मझली और छोटकी रौतिया पिता और अन्य जातियों की माता के वंशज हैं. उप समूह विभिन्न वर्गों में विभाजित हैं. इनके प्रमुख वंश हैं- लाथुर, खरकवार, खोया, रीखी, माझी, जोगी, बघेल, नाग, कटवार आदि इनके प्रमुख उपनाम हैं- गंझू, बारैक, कोटवार, साय और सिंह.

रौतिया  शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई?

रौतिया शब्द की उत्पत्ति “रावत” से हुई है, जिसका अर्थ होता है-“राजकुमार”, यह राजाओं के रिश्तेदारों द्वारा प्रयोग की जाने वाली उपाधि है. परंपराओं के अनुसार, इनके पूर्वजों ने राजपूत राजकुमार की मदद की थी और उनकी जान बचाई थी. इस बात से प्रसन्न होकर उन्हें उपहार के रूप में लोहरदगा और जशपुर में जमीन दी गई थी. इनके प्रमुख सैन्य सेवाओं की शर्त पर छोटा नागपुर के नागवंशी राजा के संपत्ति के मालिक थे.

रौतिया समाज का इतिहास

दक्षिणी छोटानागपुर प्रमंडल के जिले में निवास करने वाले रौतिया जाति के लोग पलामू के आदिवासी राजा चेरो राजवंश का वंशज होने का दावा करते हैं. 500 साल पहले पलामू में चेरो राजवंश में राजा महरथा का शासन था. कहा जाता है कि छोटानागपुर क्षेत्र में रहने वाले रौतिया समाज के लोग चेरो राजा के सैनिक थे. पलामू में उन्हें चेरो और इस क्षेत्र में रौतिया समाज के रूप में जाना जाता है. सरकारी दस्तावेजों में चेरो को आदिवासी, जबकि रौतिया को पिछड़ी जाति के रूप में मान्यता दी गई है . लेकिन ऐतिहासिक दस्तावेज, जातीय रीति रिवाज और शोध संस्थान से आदिवासियों के रहन-सहन से संबंधित दस्तावेजों से प्रतीत होता है कि रौतिया समाज और चेरो समाज एक ही है. होली के अवसर पर चेरो समाज के लोग एक रोटी का 26 टुकड़ा कर जिस देवता की पूजा करते हैं, रौतिया जाति में भी उसी देवता की पूजा करने की परंपरा है.

रौतिया समाज पर शोध कर रहे रवींद्र सिंह चेरो का कहना है कि रौतिया समाज का खुटकटी, बैगा पहनई एवं अन्य सभी परंपरा चेरोवंश से मिलता है. सरकारी दस्तावेजों में रांची जिला में चेरो जनजाति के होने की बात स्वीकार की गई है रांची में चेरो जनजाति रौतिया समाज ही है. यह बात सरकार तक पहुंचाई जाएगी और रौतिया समाज को आदिवासी समाज में शामिल कराया जाएगा.

रौतिया समाज  के प्रमुख व्यक्ति

जागीरदार बख्तर साय और मुंडल सिंहमुंडल सिंह स्वतंत्रता सेनानी थे. उन्होंने 1812 में अत्यधिक कर लगाने के खिलाफ ईस्ट इंडिया कंपनी के विरुद्ध विद्रोह किया था. उन्होंने टैक्स कलेक्टर को मार डाला और ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना को हराया था. बाद में इन्हें गिरफ्तार करके 4 अप्रैल 2012 को कोलकाता में फांसी पर लटका दिया गया था.

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