Sarvan Kumar 06/08/2021

Last Updated on 12/10/2021 by Sarvan Kumar

पासवान, दुसाध समुदाय के सदस्यों का उपनाम है। पासवान (दुसाध) भारत के अन्य राज्यों के साथ उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल राज्यों में पाई जाती है। पासवान जाति भारत की अनुसूचित जाति से संबंधित है। आइए जाानते हैैं दुसाध जाति का इतिहास। पासवानों की उत्पति कैसे हुई?

दुसाध जाति का इतिहास

दोसाध, जिसे दुसाद या दुसाध के नाम से भी जाना जाता है, उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल राज्यों में 40 लाख से अधिक लोगों का एक बड़ा समुदाय है।

1. द ट्राइब्स एंड कास्ट्स ऑफ बंगाल (1891) में एच.एच. रिस्ले ने दुसाध को बिहार और छोटानागपुर की एक  खेती करने वाली जाति के रूप में वर्णित किया है।

दुसाध जाति का इतिहास
Pari paswan- VVN Miss India Universe 2019

2. पासवान एक मार्शल और योद्धा जाति हैं, एक विचारधारा है कि वे राजस्थान के गहलोत (राजपूत) थे। वे मुगलों से लड़ते हुए राजस्थान से चले गए, और पराजित होने के बाद देश के पूर्वी हिस्सों में चले गए, और धर्मांतरण से इनकार कर दिया। विस्थापन के बाद, उन्होंने अपनी जाति और सामाजिक स्थिति खो दी।

3. दुसाध या दुसाध्य  का अर्थ है जिस पर विजय प्राप्त नहीं की जा सकती हो। जब अंग्रेज भारत आए और उनका सामना बंगाल के अंतिम स्वतंत्र नवाब सिराज उद-दौला से हुआ तो उन्हें हराने के लिए दुसाध समुदाय से मदद लेने की सलाह दी गई, जिन्हे शारीरिक रूप से मजबूत माना जाता था। अंग्रेजों ने सलाह पर काम किया और पलासी की 1757 की लड़ाई में नवाब को हराकर जीत हासिल की। रॉबर्ट क्लाइव की सेना, पलासी की निर्णायक लड़ाई जीती और भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की नींव रखी।

पासवान शब्द की उत्पति कैसे हुई?

अंग्रेजों ने दुसाधों को औपनिवेशिक सरकार के लिए चौकीदार या पुलिस मुखबिर बनाकर पुरस्कृत किया। यहीं से पासवान नाम की उत्पत्ति हुई, पासवान  एक उर्दू शब्द है जिसका अर्थ है अंगरक्षक।

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4. यह माना जाता है कि पासवानों ने मुख्य रूप से जमींदारों के लिए लाठी चलाने वाले चौकीदार या कर संग्रहकर्ता के रूप में काम किया था। जमींदारों के साथ उनकी ऐतिहासिक निकटता से उन्हें कुछ भूमि प्राप्त करने में मदद मिली।

5.पासवान कट्टर देश भक्त, धर्म के लिए कुछ भी कर सकते हैं। इस जाति के सदस्य अब समाज में विकसित हो रहे हैं। यह जाति अनुसूचित जाति में सबसे विकसित जातियों में से एक है। इस जाति के सदस्य अब समाज में विकसित हो रहे हैं। वे सभी क्षेत्रों  जैसे राजनीति, समाज सेवा, इंजीनियरिंग, चिकित्सा, प्रशासनिक सेवाओं आदि में हैं।

6. इनके कुल देवता ‘महराज चौहरमल’ माने जाते हैं, इस समाज की कुछ पूजा आज भी जीवंत है जैसे आग पर चलना, खौलते हुए दूध मे हाथ डालकर चलाना  इत्यादि।

बाबा चौहरमल

7.ये अपने आपको प्राचीन और बहुत प्रसिद्ध हिंदू पौराणिक महाकाव्य, महाभारत में  कौरव राजकुमार, दुशासन से वंश का दावा करते हैं।

8. दुसाध जाती का जिक्र ब्राह्मण, क्षत्रिय,वैश्य और शूद्र की सूचियों मे अथवा किसी ग्रंथ मे नहीं आता है, दूसरी तरफ कर्नल टाड के  अलावे अन्य लेखकों ने प्रमाण आदि द्वारा साबित करके बताया है कि “दुसाध” क्षत्रियों कि एक शाखा है, ”ब्राह्मण निर्णय” ग्रंथ के  द्वारा भी दुसाध क्षत्रिय कि एक शाखा है।

9. “क्षत्रिय वंश प्रदीप” मे ‘दुसाध’ को क्षत्रियों कि एक शाखा माना गया है भाग एक के पृष्ठ 409 ग्यारह सौ क्षत्रियों की सूची मे दुसाध का 480 वां स्थान दिखाया गया है।

10. पं ज्वाला प्रसाद द्वारा संपादित जाति भास्कर नमक ग्रंथ में गहलौतों की 24 शाखाओं मेें दुसाध भी लिखा है।

11. दुसाध राहू पूजा करते हैं, राहू पूजा केवल बिहार में दुसाधो के यहाँ होती है। यह पूजा अपने कुल पुरुष की है जो इस वंश के आदि राजा थे। यह इस जाति की पुरानी पूजा है। राहू पूजा पासवान जाति के लिए एक शक्ति का प्रतीक है।

12.पासवान समाज के लोग अलग-अलग कला में माहिर थे जैसे की शिल्प-कला, स्थापत्य कला और मंदिर बनाने की कला आदि।

13. पिछले कुछ दशकों में इस समुदाय के कई सदस्य बेहतर अवसरों की तलाश में जैसे कि नौकरी और शिक्षा आदि के लिए दिल्ली और मुंबई जैसी महानगरीय शहरों में बस गए हैं।

14.अनुसूचित जाति एवं जनजाति की श्रेणी में शामिल कमजोर लोगों के हालत में सुधार के लिए प्रदेश सरकार को उपाय सुझाने के लिए बिहार में गठित महादलित आयोग ने अपनी अनुशंसा में कहा है कि दुसाध (पासवान) जाति को अभी महादलित श्रेणी में रखना उचित प्रतीत नहीं होता।

15.दुसाध लोगों के संख्या बल, और उनकी सामाजिक और तुलनात्मक आर्थिक ताक़त ने मिलकर, शुरू से ही उनकी राजनीतिक अहमियत को बनाए रखा है।

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