Sarvan Kumar 12/10/2022
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Last Updated on 16/10/2022 by Sarvan Kumar

1842- बुंदेलखंड- बुंदेला विद्रोह, ब्रिटिश सरकार के खिलाफ पहली बगावत सन् 1842 में जैतपुर में हुई थी। यहां के राजा पारीक्षत ने इसका नेतृत्व किया था। बुंदेला विद्रोह को दबाने में शाहगढ़ राजा बखत बली और बानपुर राजा मर्दन सिंह ने अंग्रेजों का साथ दिया था. बदले में अंग्रेजों ने आश्वासन दिया था बखत बली को गढ़ाकोटा और मर्दन सिंह को चंदेरी राज्य  वापस लौटा देंगे, जो द्वारा सिंधिया द्वारा छीन लिए गए थे. अंग्रेजों ने यह वादा पूरा नहीं किया और सिंधिया से गढ़ाकोटा और चंदेरी ले लिया पर उसे बखतबली और मर्दन सिंह को नहीं दिया. इससे दोनों राजा आग बबूला हो गए, और  अंग्रेजों से बदला लेने की सोची. बखतबली ने  गढ़ाकोटा वापस लेने और अंग्रेज़ो को सबक सिखाने दौआ समाज के ठाकुर बोधन सिंह दौआ को नियुक्त किया. आइए जानते हैं. A Legend of 1857 Revolt in Bundelkhand , ठाकुर बोधन सिंह दौआ की अमर कहानी!

कौन थे बोधन सिंह दौआ?

बुंदेलखंड की शाहगढ़ रियासत के तदकलीन सूर्यवंशी बुंदेला महाराजा बखतबली ने अपना प्रधान सलाहकार के साथ शाहगढ़ का उच्च अधिकारी पद तथा शाही सेना का प्रधान सेनापति नियुक्त किया था. 3 जून 1842 को शाहगढ के महाराजा अर्जुन के मृत्यु के पश्चात जब उनके सुपुत्र बख़तबली राजा बने तब उन्होंने अपने पूर्वजों के गढ़ाकोटा इलाके को वापस अपने राज्य में मिलाने को सोचा जो ग्वालियर के सिंधिया ने छल से अपना बना लिया था। ठाकुर बोधन सिंह के पिता तथा दादाश्री भी बुंदेला नरेशों के सबसे विश्वसनीय और सम्मानित सरदार थे। पिता की मृत्यु के पश्चात जब वीरवर कुंवर बोधन सिंह बड़े हुए तो उनके पुश्तैनी जागीर की पगड़ी उनके सर बंधी तथा अपनी जागीर के ठाकुर हुए। बुंदेला वीर राजा बख्तबली ने अपने मित्र अपने विश्वसनीय दाऊ बोधन सिंह को बुला आगे की रणनीत बताते हुए कहा कि “ हे दाऊ जी, हे यदुवंशज बलराम वंशी अब समय आ गया है कि गढ़ाकोटा को भी नापाक अंग्रेज़ो से मुक्त कराया जाए । इस दुर्गम कार्य को सिर्फ आप ही अंजाम दे सकते हैं। ठाकुर बोधन सिंह ने अपने क्षत्रीय धर्म का पालन करते हुए बख़तबली को गढ़ाकोटा फतह कर सकुशल लौटने का आश्वासन दिया. आन बान शान के इस लड़ाई में ठाकुर बोधन सिंह दाऊ ने केसरिया बाणा बांध शाही सेना को तैयार रहने का आदेश दिया।

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जांबाज़ शूरमा बोधन सिंह दौआ

बोधन भाई फिरत हैं दौआ ।
मारत खात फिरत अंगरेजन, काटत ककरी जौआ।भागे फिरत अंगरेजा बेकल, दौआ हो गए हौआ।
गढ़ा से रहली तक मारे फौज़ फिरंगी कौआ “।।
ऐसे ढेरों लोकगीत आज भी बुंदेलखंड में  जांबाज़ शूरमा बोधन सिंह के सम्मान में गाए जाते हैं.

कहानी कुछ इस प्रकार शुरू होती है कि 3 जून 1842 को शाहगढ के महाराजा अर्जुन के मृत्यु के पश्चात जब उनके सुपुत्र बख़तबली राजा बने तब उन्होंने अपने पूर्वजों के गढ़ाकोटा इलाके को वापस अपने राज्य में मिलाने को सोचा जो ग्वालियर के सिंधिया ने छल से अपना बना लिया था। 4 जनवरी 1844 को संधि के तहत अंग्रेज़ो ने गढ़ाकोटा का इलाका अपने कब्जे में ले लिया। 1 जुलाई 1857 को बुंदेलखंड में क्रांति की ज्वाला भड़क गई और केंद्र बना जिला सागर। राजा बख़तबली ने क्रान्ति का नेतृत्व संभाला  शाही सेना की कमान ठाकुर बोधन सिंह दाऊ के हाथों में दी गई और बड़ी बहादुरी और कूटनीति से बोधन सिंह ने सागर को अंग्रेज़ो से मुक्त करा दिया। अगला पड़ाव गढ़ाकोटा का था जिसे आसानी से हासिल नहीं किया जा सकता था। बुंदेला वीर राजा बख्तबली ने अपने मित्र अपने विश्वसनीय दाऊ बोधन सिंह को बुला आगे की रणनीत बताते हुए कहा कि “ हे दाऊ जी, हे यदुवंशज बलराम वंशी अब समय आ गया है कि गढ़ाकोटा को भी नापाक अंग्रेज़ो से मुक्त कराया जाए । इस दुर्गम कार्य को सिर्फ आप ही अंजाम दे सकते हैं।ठाकुर बोधन सिंह ने अपने क्षत्रीय धर्म का पालन करते हुए बख्तबली को गढ़ाकोटा फतह कर सकुशल लौटने का आश्वासन दिया. आन बान शान के इस लड़ाई में ठाकुर बोधन सिंह दाऊ ने केसरिया बाणा बांध शाही सेना को तैयार रहने का आदेश दिया। 14 जुलाई 1857 को ठाकुर बोधन सिंह ने 8000 योद्धाओं की सेना का नेतृत्व कर हरहर महादेव के रणघोष के साथ गढ़ाकोटा पर चढ़ाई कर दी।  ज़बरदस्त युद्ध हुआ लेकिन कपट में माहिर अंग्रेज़ो ने छल से बोधन सिंह की सेना को जैसे तैसे परास्त कर दिया लेकिन जुझारू और मजबूत इच्छशक्ति के बोधन सिंह ने हार नहीं मानी और पुनः 22 जुलाई को पूरी ताकत के साथ गढ़ाकोटा पर चढ़ाई की और गढ़ाकोटा का दुर्ग अपने कब्जे में ले लिया। गढ़ाकोटा फतह करने के पश्चात् बोधन सिंह का अगला लक्ष्य रहली था। रहली पर उन दिनों अंग्रेज़ो ने अपने एक चापलूस गिरधारी नायक को किलेदार बना रहली की कमान सौंप रखी थी। राजा बखतबली ने ठाकुर बोधन की फ़ौज में 2000 सैनिकों की टुकड़ी, 500 लड़ाकू और  3 तोपें रहली पर चढ़ाई के लिए दी। रणकौशल और बहादुरी से ठाकुर बोधन दाऊ ने दुश्मन को धूल चटा रहली पर भी कब्जा कर लिया। राजा बख़्तबली ने ठाकुर बोधन को रहली का किलेदार घोषित कर दिया। अंग्रेज़ी हुकूमत ने अपने लेफ़्टिनेंट लासन को रहली किले पर आक्रमण के लिए भेजा लेकिन जंगबहादुर बोधन सिंह से टकराने का साहस नहीं जुटा सका और भय के मारे आधे रास्ते से ही वापस लौट गया। रहली पर अधिकार के पश्चात 14 अगस्त 1857 को बोधन सिंह ने गौड़झामर तथा देवरी को भी अपने कब्जे में ले लिया।  7 october  1857 को रहली पर  बोधन ने एक बार औऱ आक्रमण किया , पिटारे राजा का चचेड़ा भाई  इस हमले में मारा गया जो अंग्रेजो का सहयोग कर रहा था.

जब बोधन सिंह दौआ पर रखा 1000 रुपए का इनाम

अंग्रेज़ ठाकुर बोधन से इतने खौफजदा और परेशान हो गए कि उन्हें पकड़ने के 1000 रुपए की भारी राशी उन दिनों उनपर इनाम के तौर पर रखी थी लेकिन हौंसले के बुलंद बोधन उनके हाथ नहीं आए। लटकन और गणेश नामक दो क्रान्तिकारियों ने बोधन सिंह का अंत तक साथ दिया लेकिन दुर्भाग्यवश दोनों पकड़े गए और दोनों को उम्रकैद मिली। इतना ही नहीं बोधन सिंह के करीबी मित्र राय बदन सिंह ने भी अचलपुर इलाके में क्रांति की मशाल को बुलंद करे हुए था। इसने ठाकुर बोधन सिंह की सबसे ज़्यादा मदद की थी। इसी कारण दुर्भाग्यवश अप्रैल 1858 को राय बदन सिंह को अंग्रेज़ो ने फांसी दे दी थी। शाहगढ़ की बढ़ती शक्ति और प्रतिष्ठा को देख आस पास के राज्य बहुत ही जलने लगे थे। आए दिन तरह तरह के षड़यंत्र रचे जाते थे शाहगढ़ और राजा बखतबली को तबाह करने के लिए ।

राजा बखतबली का आत्मसमर्पण

आखिरकार झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की मृत्यु के पश्चात राजा बखतबली टूट से गए और ना चाहते हुए भी उन्हें परिवार और राज्य की सुरक्षा हेतु आत्मसमर्पण करना पड़ा। इसके बावजूद ठाकुर बोधन सिंह के हौंसले कमजोर नहीं हुए।

बोधन सिंह दौआ फिर गरजे

अक्टूबर 1858 को चंद्रपुरा सनोटी के जागीरदार राय चामुंडा के पुत्र मुकुंद सिंह और बोधन सिंह की सेना ने पूरी ताकत के साथ कनौरा थाने पर आक्रमण कर कई अंग्रेजो के सर काट दिए थे.

आजीवन अपराजित रहे बोधन सिंह दौआ

लाख कोशिश के बावजूद ये शायद बुंदेलखंड के इकलौते ऐसे वीर क्रांतिकारी थे जो आजीवन अपराजित रहे। इसके पश्चात उन्होंने अज्ञातवास ले लिया लेकिन आजीवन अंग्रेज़ विरोधी कार्यों में लिप्त रहे। ठाकुर बोधन सिंह बुन्देलखण्ड की माटी को वो लाल थे जो प्रारंभ से अंत तक एक महान देशभक्त शूरवीर क्रांतिकारी साबित हुए और मराठा वीर तात्या टोपे की ही भांति अंग्रेज़ो को छकाते रहे। उनकी इसी दिलेरी और शूरवीर के कारण उन्हें “बुन्देलखण्ड का तात्या टोपे बोला गया. सारे भारतीयों को नाज़ है इस दाऊवंशी भारत के इस सपूत पर. आपको याद कर हमारा सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है और खून में जोश का उबाल उठने लगता है. हम सलाम करते हैं इस दाऊवंशी अहीर के माँ पर जिसने ऐसे शूरवीर को जन्म दिया. जय कृष्णा, जय बलराम, जय हिंद.


Resources:

1. Bundelkhand ka itihas: From 1531-1857 CE. लेखक- Brijesh Kumar Srivastav.

2. Bundelkhand ka sankshipt itihas

लेखक ‘Gorelal Tiwari

3.https://amritmahotsav.nic.in/unsung-heroes-detail.htm?5897

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