Last Updated on 26/04/2023 by Sarvan Kumar
धन शब्द के कई अर्थ हैं. आमतौर पर यह शब्द पैसा या संपत्ति को संदर्भित करता है. अर्थात जिसके पास प्रचुर मात्रा में पैसा या संपत्ति है, वह धनवान है. लेकिन अगर हम गहराई से सोचें तो इस शब्द के अमूर्त पहलू भी हैं. यह शब्द न केवल मूल्यवान वस्तुओं को संदर्भित करता है, बल्कि यह शब्द मूल्यवान गुणों को भी संदर्भित करता है. अर्थात अच्छे और उत्तम गुणों से युक्त व्यक्ति भी धनी है. कोई व्यक्ति अपने अनुभव से धनी सकता है. कोई व्यक्ति अपने अनुभव का धनी सकता है. कोई व्यक्ति अपने व्यवहार का धनी हो सकता है. कोई व्यक्ति अपने विशेष गुण से धनी हो सकता है. इसी क्रम में हम यहां जानेंगे कि ब्राह्मणों का परम धन क्या है.
ब्राह्मणों का परम धन क्या है?
ब्राह्मणों के परम धन (The Ultimate Wealth of Brahmins) पर बात करने से पहले संक्षिप्त रूप से वर्ण व्यवस्था के बारे में जान लेना आवश्यक है. वर्ण व्यवस्था के तहत समाज को 4 वर्गों में बांटा गया है- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र. मूलतः यह व्यवस्था व्यक्ति के स्वभाव से उत्पन्न गुणों और कर्मों पर आधारित थी. कालांतर में यह व्यवस्था विकृत होती चली गई और यह जन्म आधारित हो गई. इस व्यवस्था के अन्तर्गत जो बल के धनी थे और जिनके ऊपर समाज की रक्षा करने का उत्तरदायित्व था, वे क्षत्रिय कहलाते थे. जो लक्ष्मी से अधिक धनी थे वे वैश्य कहलाए और जो सेवा भाव से धनी थे उन्हें शूद्र की श्रेणी में रखा जाता था.
ब्राह्मणों की बात करें तो धर्म शास्त्रों में ब्राह्मणों के मुख्य कर्तव्य पढ़ना, पढ़ाना, यज्ञ करना, ज्ञान की वृद्धि व संचय करना, समाज में सात्विक गुणों का विकास करना तथा उच्च आदर्शों की स्थापना करना बताया गया है. ब्राह्मण एक ऐसे धन के स्वामी हैं जिसे कोई लूट, चोरी या नष्ट नहीं कर सकता. ब्राह्मण का धन विद्या और ज्ञान है. विद्याधन एक ऐसा धन है जिसे कोई लूट नहीं सकता, चुरा नहीं सकता, छिन नहीं सकता या नष्ट नहीं कर सकता. ब्राह्मण के लिए ज्ञान ही उसके जीवन की संचित पूँजी है. ज्ञान के कारण ही समाज में ब्राह्मणों का सम्मान होता है अर्थात ज्ञान ही ब्राह्मणों का परम धन है.
