Sarvan Kumar 30/09/2021
माता रानी ये वरदान देना,बस थोड़ा सा प्यार देना,आपकी चरणों में बीते जीवन सारा ऐसा आशीर्वाद देना। आप सभी को नवरात्रि की शुभकामनाएं। नव दुर्गा का पहला रूप शैलपुत्री देवी का है। ये माता पार्वती का ही एक रूप हैं हिमालयराज की पुत्री होने के कारण इन्हें शैलपुत्री भी कहा जाता है। नवरात्रि के पहले दिन मां के शैलपुत्री रूप का पूजन होता है. Jankaritoday.com अब Google News पर। अपनेे जाति के ताजा अपडेट के लिए Subscribe करेेेेेेेेेेेें।
 

Last Updated on 07/09/2022 by Sarvan Kumar

वेदों के अनुसार प्राचीन समाज चार वर्णॉ में बंटी हुई थी। उनके नाम थे ब्राह्मण (Brahamin) , क्षत्रिय (Kshatriya) , वैश्य (Vaishya) और शूद्र (Shudra)। तीन वेद ( ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद) चारो वर्णॉ के संबंधित कर्तव्यों का निर्धारण करते हैं।  इन चार वर्णॉ में ब्राह्मण का कर्त्तव्य अध्ययन, अध्यापन, यज्ञ करना और करवाना , दान देना और लेना बताया गया है। वर्ण वयवस्था में सबसे ऊपर होने के कारण इन्हे जातिगत भेदभाव का सामना तो नहीं करना पड़ा पर हर वर्ग से इन्हे ईर्ष्या और द्वेष का दंश झेलना पड़ा है। सामाजिक स्थिति में पिछड़ गए लोग आज ब्राह्मण को अपने पिछड़ेपन का दोषी मानते है। भारत में कुछ निचले तबके के लोगों का हिन्दू धर्म से विमुख होकर दूसरे धर्म को अपना लेने के पीछे का वजह भी लोग ब्राह्मण अत्याचार बताते हैं। ब्राह्मण विरोध पर कई किताबें, लेख लिखकर लोगों को इनके खिलाफ विद्रोह करने की कोशिश की जाति रही है। ऐसा नही की सारे ब्राह्मण अच्छे सामाजिक स्थिति में है पर इन्हे जाति के आधार पर जनरल कैटिगरी में रखकर आरक्षण जैसे कानून लाकर इन्हे सरकारी नौकरियों, प्रतिष्ठत संस्थानो में दाखिले आदि से वंचित किया गया। हम अपने अनुभव के आधार पर यह कह सकते हैं कि ब्राह्मण कर्मशील, समझदार, धार्मिक, व्यावहारिक, सामाजिक, जुझारू और सिक्षा के महत्व समझने वाले होते हैं। आज कोई भी आदमी ब्राह्मण आचरण अपना कर सफलता का इतिहास लिख सिकता हैं। ब्राह्मण विरोध ना कर अगर हम उनके दैनिक क्रियाकलापों, उनके आदतों को अपनाएँ तो आज हम भी एक अच्छी सामाजिक स्थिति में पहुंच सकते हैं। आइए जाानते हैं ब्राह्मण समाज का इतिहास ब्राह्मणों की उत्पति कैसे हुई?

आपको बता दें की  Brahman और Brahamin दोनो अलग अलग चीजें है। जब हम जाति-व्यवस्था की बात करते हैं तो हम Brahamin की बात कर होते हैं ना कि Brahman की। हालांकि हिन्दी भाषा में Brahman और Brahamin दोनों को ब्राह्मण ही लिखा जाता है।

ब्राह्मण समाज 1913
Image: Wikipedia

भारत में ब्राह्मणों ( Brahamins)की जनसंख्या

भारतीय जनसंख्या में ब्राह्मणों का दस प्रतिशत है तथापि धर्म, संस्कृति, कला तथा शिक्षा के क्षेत्र में देश कि आजादी और भारत राजनीति में महान योगदान रहता आया है। उत्तर प्रदेश=14%, बिहार=7%, उत्तराखंड=25%, हिमाचल प्रदेश=18%, मध्यप्रदेश=6% , राजस्थान=9.5%, हरियाणा=10%, पंजाब=7%, जम्मू कश्मीर=12%, झारखंड= 5%, दिल्ली=15% और देश कि लगभग=10% है ।
(आपको बता दें कि आजादी के बाद जातिगत गणना नही हुई है उपरोक्त आंकड़े विभिन्न अखबारों मे प्रकाशित समाचारों के आधार पर ली गई है।)

ब्राह्मण (Brahamin) किस कैटेगरी में आते हैं?

सामान्य श्रेणी में जाति राज्य पर निर्भर है। यह उस राज्य पर निर्भर करता है जिसमें आप रहते हैं हरियाणा और पंजाब में जाट सामान्य हैं लेकिन अन्य सभी राज्यों में ओबीसी हैं। भारत भर में ब्राह्मण, मुख्य रूप से सामान्य जाति ( General Category) से हैं।

Nagar Brahmins in Western India (c. 1855-1862)
Image: Wikipedia

ब्राह्मण (Brahamin) के प्रकार

स्मृति-पुराणों में ब्राह्मण के 8 भेदों का वर्णन मिलता है:- मात्र, ब्राह्मण, श्रोत्रिय, अनुचान, भ्रूण, ऋषिकल्प, ऋषि और मुनि। ब्राह्मणों के सरनेम और विधि-विधान में अंतर दिखता है। जबकि ब्राह्मण मूल रूप से एक हैं। फिर सहज सवाल उठता है कि उनके सरनेम अलग क्यों हैं? ब्राह्मणों के उपनाम कई आधार है, ब्राह्मणों  के कई प्रकार हैं।

ब्राह्मणों की उत्पति कैसे हुई?

ईश्वर ने सृष्टि की रक्षा के लिए अपने मुख, भुजा, ऊरु(जंघा) और चरणों से क्रमशः ब्राह्मण ,क्षत्रिय, वैश्य तथा शुद्र इन चार वर्णों को उत्पन्न किया और उनके लिए अलग-अलग कर्मों की  निर्धारण  की। ब्राम्हणों के  लिए पढ़ना,  पढ़ाना, यज्ञ करना, यज्ञ कराना तथा दान देना और दान लेना बताया गया ।  पुरुष देह में नाभि से ऊपर का भाग अत्यंत पवित्र माना गया है उसमें भी मुख प्रधान है।  ब्राह्मण ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न हुआ है इसीलिए ब्राह्मण सबसे उत्तम है वह वेद की वाणी है।  ब्रह्मा जी ने बहुत काल तक तपस्या करके सबसे पहले देवता और पितरों को  लाभ  पहुंचाने के लिए और संपूर्ण संसार की रक्षा करने हेतु ब्राह्मणों को उत्पन्न किया। शीर्ष  भाग से उत्पन्न होने और वेद को धारण करने के कारण संपूर्ण संसार का स्वामी ब्राह्मण ही है। जिस ब्राह्मण के  शास्त्रों में निर्दिष्ट गर्भाधान,  पुंसवन आदि 48 संस्कार विधि पूर्वक हुए हो वही ब्राह्मण ब्रह्मलोक और ब्राह्मणत्व को प्राप्त करता है वही असली ब्राह्मण है। संस्कार ही ब्राह्मणत्व प्राप्ति का मुख्य कारण है।

ब्राह्मणों की व॔शावली

भविष्य पुराण के अनुसार ब्राह्मणों  का ( Brahamins) इतिहास है। प्राचीन काल में महर्षि कश्यप के पुत्र कण्व की आर्यावनी नाम की देव कन्या पत्नी हुई। ब्रम्हा की आज्ञा से दोनों कुरुक्षेत्र वासनी सरस्वती नदी के तट पर गये और कण् व चतुर्वेदमय सूक्तों में सरस्वती देवी की स्तुति करने लगे एक वर्ष बीत जाने पर वह देवी प्रसन्न हो वहां आयीं और ब्राम्हणो की समृद्धि के लिये उन्हें वरदान दिया।
वर के प्रभाव कण्वय के आर्य बुद्धिवाले दस पुत्र हुए जिनका
क्रमानुसार नाम था –

1.उपाध्याय 2. दीक्षित 3. पाठक  4. शुक्ला  5.मिश्रा            6. अग्निहोत्री 7. दुबे  8. तिवारी 9. पाण्डेय 10. चतुर्वेदी 
इन लोगो का जैसा नाम था वैसा ही गुण।

इन लोगो ने नत मस्तक हो सरस्वती देवी को प्रसन्न किया। बारह वर्ष की अवस्था वाले उन लोगो को भक्तवत्सला शारदा देवी ने अपनी कन्याए प्रदान की।
वे क्रमशः
1.उपाध्यायी 2. दीक्षिता  3. पाठकी 4. शुक्लिका 5.मिश्राणी 6. अग्निहोत्रिधी, 7. द्विवेदिनी 8. तिवेदिनी 9. पाण्ड्यायनी, 10. चतुर्वेदिनी कहलायीं।

ब्राह्मणों के गोत्र

उन कन्याआओं के भी अपने-अपने पति से सोलह-सोलह पुत्र हुए हैं
वे सब गोत्रकार हुए जिनका नाम
1. कष्यप 2. भरद्वाज 3. विश्वामित्र 4. गौतम 5. जमदग्रि,
6. वसिष्ठ 7.वत्स 8. गौतम 9. पराशर 10. गर्ग 11.अत्रि,
12. भृगडत्र 13.अंगिरा 14. श्रंगी 15. कात्याय 16.
याज्ञवल्क्य।

ब्राह्मणों की आज की स्थिति

ब्राह्मण  शिक्षकों, कानून निर्माताओं, विद्वानों, डॉक्टरों, योद्धाओं, लेखकों, कवियों, भूमि मालिकों, राजनेताओं के रूप में भी उत्कृष्ट प्रदर्शन किया है। आधुनिक ब्राह्मण माता-पिता अपने बेटों को कंप्यूटर प्रोग्रामर और इंजीनियर बनाने की ख्वाहिश रखते हैं। ब्राह्मण समाज देश के लिए कितना महत्वपूर्ण हैं और देश निर्माण में उनका  कितना योगदान है ये आपको   Brahamin Famous list  से पता चलेगा। ब्रह्माण समाज के प्रसिद्ध व्यक्तियों का अगर लिस्ट बनाया जाए तो ये अनगिनत हैं।

A Brahamin in Devghar Jharkhand

क्या ब्राह्मण विदेशी हैं?

संभवतः ब्राह्मण लगभग 2500 साल पहले वैदिक युग में शक्तिशाली थे।

कुछ इतिहासकारों का मत है कि भारत का ब्राह्मण समुदाय (साथ में छत्रिय और वैश्य ) भारत के मूलनिवासी नहीं है। इनका मूल निवास स्थान कैस्पियन सागर के प्रदेश तथा दक्षिणी रूस के मैदान थे, जहां से वे ईरान के रास्ते भारत तक आए । मत के अनुसार जब आर्य अपने-अपने अन्य बन्धुओँ का साथ छोड़कर आगे बढ़े तो कुछ लोग ईरान में बस गये तथा कुछ लोग और आगे बढ़कर भारत में आ बसे। यही लोग indo-european आर्य कहलाए। आर्य का अर्थ है श्रेष्ठ / उत्तम / पूज्य/ मान्य / कुलीन / योग्य इत्यादि।

ईरान के इस्लामी बनने से पहले वह पारसी था। प्राचीन हिंदू स्वयं को आर्य और अपनी मातृभूमि आर्य-वर्त कहते थे। एक और आर्य समुदाय जो उसी समय ईरान में रहता था। ईरान, वास्तव में, आर्यन के लिए फारसी शब्द है। ईरानी खुद को आर्य के रूप में देखते हैं।

आर्य शब्द का सबसे पुराना शिलालेख पूर्वी ईरान से 2500 ईसा पूर्व बेहिस्टुन शिलालेख से आता है जिसमें फारसी राजाओं डेरियस द ग्रेट और ज़ेरक्स को “Aryans of Aryan stock” (arya arya chiça )के रूप में वर्णित किया गया है।

इस दावे को साबित करने के लिए वे कुछ तर्क भी देते हैं।
भारतीय आर्यों की भाषा संस्कृत की संरचना और उच्चारण यूरोपियन भाषा ग्रीक और लैटिन से मिलती-जुलती है।

वेद और अवेस्ता में समानता

भारत और ईरान-दोनों की ही शाखा होने के कारण, दोनों देशों की भाषाओं में पर्याप्त साम्य पाया जाता है। इन देशों के प्राचीनतम ग्रन्थ क्रमश: `ऋग्वेद’ तथा `जेन्द अवेस्ता’ हैं। जेन्द’ की भाषा पूर्णत: वैदिक संस्कृत की अपभ्रंश प्रतीत होती है तथा इसके अनेक शब्द संस्कृत शब्दों से मिलते-जुलते है।
• पवित्र वृक्ष तथा पेय ‘सोम’ (वैदिक) एवं अवेस्ता में ‘हाओम’,

• मित्र (वैदिक), अवेस्ता और प्राचीन पारसी भाषा में ‘मिथ्र’

• भग (वैदिक), अवेस्ता एवं प्राचीन पारसी में ‘बग
• ईरानीयो धर्म ग्रंथ ईरान यू का धर्म ग्रंथ अवेस्ता है जो संस्कृत शब्द अवस्था का अपभ्रंश है

भाषा के अतिरिक्त वेद और अवेस्ता के धार्मिक तथ्यों में भी पार्याप्त समानता पाई जाती है।

1. दोनों में ही एक ईश्वर की घोषणा की गई है।

2 मन्दिरों और मूर्तियों के लिए कोई स्थान नहीं है।

3. वेद में इंद्र को तथा अवेस्ता में वरुण को देवताओं का अधिराज माना गया है।

4. वैदिक `असुर’ ही अवेस्ता का `अहर’ है।

5.वस्तुत: यज्ञ, होम, सोम की प्रथाएं दोनों देशों में थीं।

5. ईरानी `मज्दा’ का वही अर्थ है, जो वैदिक संस्कृत में `मेधा’ का।

ब्राह्मण के विदेशी होने का DNA सबूत

हरियाणा में सिंधु घाटी सभ्यता स्थल राखीगढ़ी में पाए 2500 साल ईसा पूर्व गए कंकालों के डीएनए नमूनों के अध्ययन में R1a1 जीन या मध्य एशियाई ‘स्टेप’ जीन का कोई निशान नहीं मिला है, जिसे ‘आर्यन जीन’ कहा जाता है। हालांकि आर्य सिद्धांत के मानने वाले लोग  यह तर्क देते हैं कि तब आर्यों का आगमन हुआ ही नहीं था, उनका आगमन तो 1500 से 2000 ईसा पूर्व हुआ था।

रिपोर्ट में तीन बिंदुओं को मुख्य रूप से दर्शाया गया है। पहला, प्राप्त कंकाल उन लोगों से ताल्लुक रखता था, जो दक्षिण एशियाई लोगों का हिस्सा थे। दूसरा, 12 हजार साल से एशिया का एक ही जीन रहा है। भारत में विदेशियों के आने की वजह से जीन में मिक्सिंग होती रही।

इसके अलावा, इस अध्ययन में आज के पाकिस्तान में स्वात घाटी से लगभग एक हजार साल बाद, 1200 ईसा पूर्व के बाद के 41 प्राचीन डीएनए नमूनों तक पहुंच थी, जो हड़प्पा सभ्यता की परिधि भी है। इन नमूनों ने मध्य एशियाई वंश की महत्वपूर्ण उपस्थिति दिखाई।

आर्य आक्रमण सिद्धांत

आर्य आक्रमण सिद्धांत को भारत के पूर्व औपनिवेशिक शासकों के दिमाग की उपज कहा जाता है, जिन्होंने इस विचार को आगे बढ़ाया कि देश की उच्च जातियों के सदस्य मध्य एशिया के आर्य आक्रमणकारियों के वंशज थे जो यूरोपीय लोगों के पूर्वज भी हैं। कई  विद्वानों का मत है आर्य आक्रमण सिद्धांत अंग्रेजों द्वारा इंडिया पर फूट डालो राजनीति करो के तौर पर किया गया था।  सिर्फ भाषा को आधार नहीं बनाया जा सकता है। ब्राह्मणों के विदेशी होने का कोई पक्का प्रमाण नहीं है। इतिहासकार का यह कहना  की यूरेशिया से आर्यन लोग  इंडिया आए थे यह पूरी तरह गलत है, और यह सब , बस अंग्रेजों द्वारा यूरोपीयंस को श्रेष्ठ दिखाने के लिए दिया गया है।

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