Ranjeet Bhartiya 17/03/2023
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Last Updated on 17/03/2023 by Sarvan Kumar

उनका स्पर्श अपवित्र होता था. उन्हें गांव के कुएं से पानी भरने की इजाजत नहीं थी. उन्हें गांवों के बाहरी इलाकों में रहने के लिए बाध्य किया जाता था. गाँव का नाई उनकी हजामत नहीं बनाता था. गांव का धोबी उनके कपड़े नहीं धोते थे उन्हें मान्यता प्राप्त हिंदू मंदिरों में प्रवेश करने की अनुमति नहीं थी. रूढ़िवादी हिंदू समारोहों में भाग लेने की अनुमति नहीं थी. वे एक पगड़ी भी नहीं पहन सकते थे. उन्हें ब्राह्मणों की बस्ती में आने की मनाही थी, अगर किसी काम से बहुत जरूरी है तो पीठ के पीछे झाड़ूनुमा कुछ ऐसा बांधना होता था ताकि दलित के पाँव के निशान साथ-साथ मिट जाए, गले में हांडी बांधनी होती थी ताकि दलित अपना थूक जमीन पर थूकने की बजाए उस हांडी में थूक ले. ब्राह्मणों के लिए जो रास्ते बने हुए थे उन पर दलितों का प्रवेश कठोरता से वर्जित था. गलती से कोई ब्राह्मण सामने से आता हुआ दिख भी जाए तो दलित को उस रास्ते से दूर हट कर मुँह फेर कर तब तक बैठे रहना था तब तक ब्राह्मण वहाँ से गुजर न जाये . ऐसा ही कुछ हाल पेशवाओं के शासनकाल में दक्कन (आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक ) के महारों पर भी था और कच्छ के मेघवालो और थोड़ी बहुत हर दलित समाजों पर था.आइए जानते है छुआछूत के बारे में जानकारी, कब से और क्यों है?

छुआछूत कैसी पनपा?

अब सवाल उठता है कि मेघवाल,महार या दूसरी दलित जातियां अछूत क्यों मानी जाती थी. कुछ लोग कहते है कि ये ब्राह्मण समाज की बनाई वर्ण व्यवस्था है लेकिन हिन्दू धर्म ग्रंथों में चार वर्ण बताई गयी है ना कि जाति. लोग अलग- अलग धर्म ग्रंथों को सन्दर्भित करते है, पर हिन्दुओं की सबसे प्रामाणिक ग्रंथ वेदों में कहीं भी इन जातियों का उल्लेख नहीं है. हां बुनकर (जुलाहे), चर्मकार, बढ़ई और चित्रकार , रथकार इत्यादि का जिक्र जरूर मिलता है पर ये व्यावसायिक समूह थे ना कि वंशानुगत. जैसे पूजा पाठ कराने वाले को ब्राह्मण कहा जाता था, रक्षक वर्ग को क्षत्रिय व्यापार करने वाले को वैश्य जो इन तीन कामों को छोड़कर चौथा काम करता था वो शूद्र था. पर शूद्र कहीं से अछूत नहीं समझा जाता था. जो जिस काम में निपुण या योग्य होता था वो उस काम को करता था. जैसे आज एक ऑफिस में मैनेजर, उसके ऊपर भी कई पद होते हैं. मैनेजर के बाद क्लर्क उसके बाद चपरासी, स्वीपर इत्यादि होता है. खान-पान शादी ब्याह बराबर वालों में होती है इसका मतलब यह नहीं हुआ कि मैनेजर बाकी सबको शूद्र समझते है.
जिस तरह आज भी अक्सर नेता का बेटा नेता, डाक्टर का बेटा डॉक्टर होता है उसी तरह से प्राचीन समय में भी लोग अपने पिता का ही प्रोफेशन अपनाते थे. हज़ारों वर्ष से यही होने के कारण व्यावसायिक समूह जातियों में बदल गयी. पर इन सबसे हटकर छुआछूत समाज में कब पनपी ये समझने वाली बात है.
दो तरह के काम होता है, एक शुद्ध और अशुद्ध हालांकि काम तो काम होता है पर समाज के कुछ काम को बहुत ही ज्यादा अपवित्र माना है. जैसे मरे हुए जानवर की खाल उताड़ना, मैला ढोना इत्यादि. कोई भी व्यक्ति ऐसा काम नहीं करना चाहेगा पर मजबूरीवश या जबरदस्ती जिन लोगो ने ये काम किया उनके लिए हमारे दिल में सम्मान होना चाहिए ना की नफरत. जिन लोगों को हमें गले लगाना चाहिए उनको हमने गाँव के बाहर रहने के लिए विवश कर दिया. उन्हें हमने खाने पीने में दिक्कत कर दिया और शिक्षा से दूर रखा. उन्हें हमने नारकीय जीवन दिया , शर्म आनी चाहिए हमें.एक और बात जिस पर हमें ध्यान देने की जरूरत है कि हमें अपने काम का सोच समझकर चयन करना चाहिए. हम कोई भी ऐसे काम कर के जीवन निर्वाह नहीं करना चाहिए जो हमे रोटी तो देती है पर हमसे हमारी इज्जत छीन लेती है.

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