Ranjeet Bhartiya 06/11/2022
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Last Updated on 06/11/2022 by Sarvan Kumar

जाटव चमारों की एक उपजाति है. चमार जाति समूह में सैकड़ों उपजातियां हैं जैसे कि चमारी, रामनामी, सूर्यवंशी, सूर्यरामनामी, रैदास, अहिरवार, कुरील, धुसिया और जैसवार आदि. उपजातियां आमतौर पर विखंडन की प्रक्रिया के कारण उत्पन्न होती हैं. लेकिन जाति और उपजाति के बीच का अंतर बहुत महीन होता है. इस लेख में हम जाटव जाति की विशेषताओं को रेखांकित करने का प्रयास करेंगे और जानेंगे कि जाटव किसे कहते हैं.

जाटव किसे कहते हैं?

सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि उपजातियां क्यों बनती हैं. क्षेत्रीय अलगाव, मिश्रित मूल, व्यावसायिक मतभेद, व्यावसायिक तकनीकों में अंतर, रीति-रिवाजों में बदलाव, राजनीतिक निर्णय और नए उपनामों को अपनाने आदि जैसे कई महत्वपूर्ण कारक हैं जो एक जाति के भीतर नई उपजातियों के गठन की ओर ले जाते हैं. जाटवों के बारे में निम्नलिखित महत्वपूर्ण बातों का उल्लेख मिलता है-

•जाटव को जाटिया के नाम से भी जाना जाता है, जो चमार जाति समूह के अंतर्गत आते हैं. इनमें से अधिकांश अपने सरनेम के रूप में सिंह शब्द का प्रयोग करते हैं. कहा जाता है कि जाट शासक सूरजमल के शासन काल में जाटों ने इनका शोषण किया गया. इस समुदाय के लोगों ने ‘जाटव सभा’ नामक एक जातीय संगठन का गठन किया और समाज में उत्पीड़न और निम्न स्थिति के खिलाफ विद्रोह किया. इस समुदाय के एक वर्ग ने अपने पारंपरिक व्यवसाय को त्याग कर सिलाई, कृषि, सरकारी सेवा आदि का पेशा अपना लिया. ‘जाटव सभा’ ने तत्कालीन महाराजा से जाट के रूप में पहचानने की अपील की. राजा किशन सिंह इस समूह को जाटव के रूप में मान्यता देने के लिए सहमत हो गए. पहले वह खुद को जटिया और बाद में जाटव कहने लगे, वह खुद को चमार के रूप में पहचानने के विरोध में थे.

• मायावती जब उत्तर प्रदेश की राजनीति में स्थापित हुईं तो जाटव समुदाय पर इसका व्यापक प्रभाव पड़ा. जाटव मायावती के साथ एकजुट हो गए. जाटव को दलितों में सबसे मजबूत जाति माना जाता है और हर दृष्टि से यह बाकी दलितों से आगे हैं. विशेष रुप से पश्चिम उत्तर प्रदेश में यह समुदाय काफी प्रभावशाली है. दलितों में जाटव सवर्ण जैसे माने जाते हैं.

•व्यवसाय, रहन-सहन, खानपान, धार्मिक परंपरा, आर्थिक स्थिति, शिक्षा और राजनीतिक पहुंच के मामले में जाटव और अन्य दलित जातियों में जमीन-आसमान का अंतर है. आजादी से पहले भी और बाद में भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इन लोगों ने अपने को जाटव के नाम से संगठित किया था. इनमें से कुछ क्षत्रिय वंश से जोड़कर अपने नाम के आगे ‘सिंह’ लगाने लगे.

References:
•Rajasthan Part 1, 1998
Publisher:Popular Prakashan
Editors:B. K. Lavania, K. S. Singh
Contributor:Anthropological Survey of India

•A Social Force in Politics
Study of Scheduled Castes of U.P.
By M. P. S. Chandel · 1990

•चमार की चाय
By Śyorājasiṃha Becaina · 2017

•Delhi Ki Anusuchit Jatiyan Va Aarakshan Vyavastha
By Ramesh Chander · 2016

•Apane-apane pin̄jare
By Mohanadāsa Naimiśarāya · 1995

•Mainne daṅgā dekhā
eka riporṭara kī ḍāyarī
By Manoja Miśra · 2007

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