Last Updated on 05/11/2022 by Sarvan Kumar
अगर हम किसी व्यक्ति को नियंत्रित करना चाहते हैं तो यह जानना जरूरी है कि उसकी कमजोरियां क्या हैं और उसके मजबूत पक्ष क्या हैं. इसी तरह यदि आप अगर किसी समुदाय को नियंत्रित करना चाहते हैं तो उन कारकों को समझना होगा जो उस समाज को कमजोर या मजबूत बनाते हैं. इसी क्रम में आइए जानते हैं कि जाटव को कैसे काबू में किया जाए.
जाटव को कैसे काबू करें
सामाजिक स्थिति, शिक्षा, आर्थिक स्थिति, विभिन्न क्षेत्रों में प्रतिनिधित्व, जागरूकता, सामाजिक एकीकरण, जनसंख्या और राजनीतिक भागीदारी आदि जैसे कारक तय करते हैं कि कोई समुदाय मजबूत है या कमजोर.आइए हम इन कारकों पर जाटव समुदाय का विश्लेषण करते हैं.
जातिगत भेदभाव और अस्पृश्यता
ऐतिहासिक रूप से जाटव सामाजिक समूह को चमार जातियों का अंग माना जाता है. अतीत में चमार समुदाय चमड़े के काम में शामिल रहा है जिसे एक अशुद्ध व्यवसाय माना जाता था, इसीलिए पूर्व में इस समुदाय को जातिगत भेदभाव और अस्पृश्यता का सामना करना पड़ा है. यानी सामाजिक भेदभाव और अस्पृश्यता के माध्यम से समाज के तथाकथित उच्च वर्गों द्वारा इनका शोषण और नियंत्रण किया जाता रहा है. यहां यह उल्लेख करना जरूरी है कि जातिगत भेदभाव और अस्पृश्यता सभ्य समाज के माथे पर कलंक है, जिसे किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता.
आबादी
भारत में दलित समुदाय की सैकड़ों जातियां निवास करती हैं. दलित या अनुसूचित जातियों में जाटव या चमार जाति की आबादी सबसे ज्यादा है. भारत के कई राज्यों में, चमार जाति समूह की आबादी 5 से 14% के बीच है.
शिक्षा, विभिन्न क्षेत्रों में प्रतिनिधित्व और आर्थिक स्थिति
स्वतंत्रता के बाद, भारतीय संविधान में सभी नागरिकों के लिए समान अवसर प्रदान करते हुए, सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों या अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की उन्नति के लिए संविधान में विशेष धाराएँ रखी गईं. नौकरियों और शिक्षा में पिछड़ी और अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण देने की शुरुआत की गई. आरक्षण का उद्देश्य शिक्षा और नौकरियों में सभी वर्गों को उचित प्रतिनिधित्व देकर उच्च-निम्न, गरीब-अमीर, सामाजिक असमानता को पाटकर सामाजिक न्याय और समानता प्रदान करना था. दलितों में कुछ विशेष जातियाँ विकास के रास्ते पर काफी आगे आ चुकी हैं जिसमें जाटव भी शामिल हैं. आरक्षण का लाभ उठाकर जाटव समुदाय ने शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है. वर्तमान में सरकारी नौकरियों में इस समुदाय का प्रतिनिधित्व पहले की तुलना में काफी बढ़ गया है. शिक्षा ने इनके लिए विभिन्न अवसरों के द्वार खोले हैं. परिणामस्वरूप सरकारी और निजी क्षेत्रों में भी जाटव समुदाय की उपस्थिति बढ़ी है और यह आर्थिक रूप से मजबूत हुए हैं.
जागरूकता और सामाजिक एकीकरण
चमारों की गई उपजातियां हैं, लेकिन जागरूकता के मामले में जाटव अग्रणी हैं. काफी पहले से ही जाटव समुदाय के लोग खुद को समाज में एक प्रतिष्ठित समुदाय के रूप में स्थापित करने का प्रयास करने लगे. इसके लिए इन्होंने नीच कार्यों से को त्याग दिया और इच्छानुसार पेशे का चुनाव करने लगे, शिक्षा पर जोर दिया तथा उच्च सामाजिक स्थिति और क्षत्रिय होने का दवा करने लगे. इससे जाटव समुदाय को ऊर्ध्वगामी सामाजिक गतिशीलता हासिल हुई जिससे सामाजिक एकता का मार्ग प्रशस्त हुआ और जिसकी परिणति राजनीतिक प्रभुत्व में हुई.
राजनीतिक भागीदारी
अनुसूचित जातियों की राजनीति में भागीदारी बढ़ाने के लिए आरक्षित सीटों की व्यवस्था है. आजादी के बाद राजनीति के क्षेत्र में जाटवों का प्रतिनिधित्व लगातार बढ़ा है. उत्तर प्रदेश की बात करें तो जाटव समुदाय की राज्य की कुल अनुसूचित जाति जनसंख्या का 54 प्रतिशत हिस्सा है और राजनीति रुप से काफी मजबूत है. सत्ता की भागीदारी में दलित समाज में जाटव ही आगे हैं. उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती इसी समूह से आती हैं.
जाटव को काबू में कैसे करें- निष्कर्ष:
सच्चाई यह है कि दलित समुदाय की कई जातियां, जिसमें जाटव भी शामिल है, अपनी वस्तुपरक परिस्थितियों में अवगत होकर, जातिगत भेदभाव, छुआछूतसभी जैसी बाधाओं से लड़ते हुए और विकास के अवसरों का लाभ उठाकर विकास और सशक्तिकरण के मार्ग पर काफी आगे निकल चुकी है. इन्हें अब दबाया नहीं जा सकता है अर्थात काबू में नहीं किया जा सकता है. केवल आपसी समझ, सम्मान और समान व्यवहार से इनका दिल जीता जा सकता है.
References:
•Uttar Pradesh 2022/उत्तर प्रदेश चुनाव 2022
Jatiyon Ka Punardhruvikaran/जातियों का पुनर्ध्रुवीकरण
By Pradeep Srivastav/प्रदीप श्रीवास्तव · 2022
•Samkaleen Hindi Dalit Sahitya : Ek Vichar Vimarsh
By Surajpal Chauhan
•Dalit Jnan-Mimansa- 02 Hashiye Ke Bheetar
By Edited by Kamal Nayan Chaube · 2022
