वर्ण व्यवस्था प्राचीन काल में भारतीय सामाजिक व्यवस्था का एक हिस्सा थी, जिसमें 4 मुख्य वर्ण शामिल थे: ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र. इसमें ब्राह्मणों का मुख्य कर्तव्य पठन- पाठन और धार्मिक अनुष्ठान करना था. क्षत्रिय का मुख्य कर्तव्य बाहरी आक्रमण से समाज और देश की रक्षा करना, वैश्य का कृषि और व्यापार करना और शूद्र का कर्तव्य ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य की सेवा करना था. वर्ण व्यवस्था ब्राह्मणों को समाज में सबसे ऊंचा स्थान देती थी और उन्हें श्रेष्ठता का दर्जा देती थी. इसी क्रम में यहां हम जानेंगे कि ब्राह्मण क्यों सर्वश्रेष्ठ हैं.
ब्राह्मण क्यों सर्वश्रेष्ठ हैं?
ब्राह्मण को निम्न कारणों से सर्वश्रेष्ठ माना जाता है:
•यह समझने के लिए कि ब्राह्मण सर्वश्रेष्ठ क्यों हैं, हमें वर्ण व्यवस्था के सिद्धांतों को समझना होगा. वर्ण व्यवस्था के पारंपरिक सिद्धांत के अनुसार सृष्टि के रचयिता ब्रह्म के मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय, जंघाओं से वैश्य और पैरों से शूद्र वर्ण की उत्पत्ति हुई है. इसमें मुख को ज्ञान एवं वाणी का प्रतीक, भुजाओं को शक्ति का प्रतीक, जंघा को आर्थिक उत्पादन एवं व्यापार का प्रतीक तथा पैर को सेवा का प्रतीक माना गया है. इस प्रतीकात्मक व्याख्या के अनुसार अंगों की उच्चता एवं निम्नता वर्णों की उच्चता एवं निम्नता को दर्शाता है. क्योंकि मुख, हाथ, जांघ और पैर से ऊपर स्थित है और ब्राह्मणों की उत्पत्ति ब्रह्मा जी के मुख से मानी गई है, इसलिए इस व्याख्या के अनुसार ब्राह्मण सर्वश्रेष्ठ हैं.
•वर्ण व्यवस्था के गुण सिद्धांत के अनुसार, किसी व्यक्ति का वर्ण जन्म या परिवार से नहीं, बल्कि उसके गुणों के आधार पर निर्धारित होता है. यहां महाभारत की एक घटना का जिक्र जरूरी है. जब जल देवता युधिष्ठिर से पूछते हैं कि ब्राह्मण कौन है? तो युधिष्ठिर उत्तर देते हैं- जो सत्यवादी, दानशील, दयालु, क्षमाशील, चरित्रवान और तपस्वी है, वही ब्राह्मण है. इस पर जल देवता दूसरा प्रश्न करते हैं- यदि यह गुण शूद्र में हों तो? इस पर युधिष्ठिर उत्तर देते हैं- तो वह शूद्र नहीं ब्राह्मण है. साथ ही यदि किसी ब्राह्मण में इन गुणों का अभाव हो तो हम उसे ब्राह्मण नहीं शूद्र कहेंगे. हिंदू धार्मिक ग्रंथों के अनुसार व्यक्ति में तीन तरह के गुण होते हैं- सतोगुण, तमोगुण और रजोगुण. ब्राह्मण में सतोगुण, क्षत्रिय में रजोगुण, वैश्य में तमो मिश्रित रजोगुण और शूद्र में तमोगुण की प्रधानता होती है. इन तीनों गुणों में सतोगुण अन्य गुणों की तुलना में अधिक शुद्ध होने के कारण व्यक्ति को पाप कर्मों से मुक्त कर आत्मा को प्रकाशित करने वाला माना जाता है, और इस प्रकार सतोगुण की प्रधानता के कारण ब्राह्मणों को श्रेष्ठ माना गया है.
•धर्म शास्त्र ब्राह्मणों को उच्चतम ज्ञान और अनुभव प्राप्त करने की अनुमति देते हैं, जिसके कारण व अन्य लोगों को शिक्षा दे सकते हैं और धार्मिक कार्यों में उनका मार्गदर्शन कर सकते हैं. यह माना जाता है कि ब्राह्मण स्वाभाविक रूप से अन्य जातियों के सदस्यों की तुलना में अधिक अनुष्ठान शुद्धता रखते हैं और वे अकेले ही कुछ महत्वपूर्ण धार्मिक कार्यों को करने में सक्षम हैं. इसलिए ब्राह्मणों को श्रेष्ठ माना गया है. यहां यह उल्लेखनीय है कि प्रत्येक वर्ण अपने क्षेत्र में महत्वपूर्ण होता है और समाज के संतुलन और समरसता के लिए आवश्यक है. वर्ण व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य समाज की संरचना, कार्य विभाजन और उचित विनिमय सुनिश्चित करना है. सर्वश्रेष्ठता व्यक्ति के गुणों, कर्मों और नैतिक मूल्यों पर निर्भर करती है, न कि उसकी जाति या वर्ण के आधार पर.
References:
•आधुनिक भारत में सामाजिक परिवर्तन
By डाँ. जे. पी. सिंह, · 2016
