Sarvan Kumar 12/12/2018

शत्रुघ्न सिन्हा और राजेश खन्ना अच्छे दोस्त हुआ करते थे। उन्होंने कई फिल्मों में एक साथ काम किया। जिन फिल्मों में दोनों ने साथ काम किया उनमे प्रमुख हैं- दिल-ए-नादान, आज का एमएलए राम अवतार पापी पेट का सवाल है, मकसद और राम तेरे कितने नाम।

फिर ऐसा क्या हो गया की दोनों की दोस्ती टूट गई?

इसके लिए आप को समझना होगा कि राजेश खन्ना राजनीति में कैसे आए-
राजेश खन्ना बॉलीवुड के सबसे पहले सुपरस्टार थे। जानकारों का मानना है कि राजेश खन्ना का स्टारडम भले ज्यादा दिनों तक नहीं  नहीं रहा लेकिन किसी फिल्मी सितारे के लिए भारत में ऐसी दीवानगी फिर कभी नहीं देखी गई। वो देश के लोगों के दिल में उतर गए।

राजीव गांधी को एक ऐसे गैर राजनीतिक चेहरे की जरूरत थी जो भीड़ इकट्ठी कर सके। जिसका फायदा कांग्रेस पार्टी को पहुंचाया जा सके। उनके लिस्ट में इस काम के लिए सबसे ऊपर जिसका नाम था वो थे- राजेश खन्ना।

इस तरह से राजीव गांधी के कहने पर राजेश खन्ना राजनीति में आ गए। राजेश खन्ना पहले से ही कांग्रेस पार्टी के सपोर्टर थे। उनके पास नाम और शोहरत पहले से ही था।उनके लिए राजनीति में आना समाज सेवा और देश सेवा करने का एक सुनहरा मौका था। राजेश खन्ना इस मौके का फायदा उठाते हुए राजीव गांधी के कहने पर राजनीति में आ गए।

राजेश खन्ना को पहली बार 1991 में नई दिल्ली लोकसभा सीट पर उतारा गया। उनके अपोजिट थे भारतीय जनता पार्टी के कद्दावर नेता लालकृष्ण आडवाणी । इस चुनाव में राजेश खन्ना कम अंतर से हार गए। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुयी। लाल कृष्ण आडवाणी दो जगहों से चुनाव लड़े थे- नई दिल्ली और गांधीनगर।  आडवाणी दोनों जगहों से चुनाव जीतने में सफल रहे। उन्हें एक सीट खाली करना था और उन्होंने नई दिल्ली का सीट खाली कर दिया।

नई दिल्ली उपचुनाव 1992 जब आमने-सामने  थे  शत्रुघ्न सिन्हा और राजेश खन्ना

आडवाणी के नई दिल्ली लोकसभा सीट खाली किए जाने के बाद यहां पर उपचुनाव होना था। इस बार कांग्रेस के प्रत्याशी तो राजेश खन्ना ही थे लेकिन उनके खिलाफ थे बीजेपी से शत्रुघ्न सिन्हा।

इस उपचुनाव में कुल 125 प्रत्याशी मैदान में थे। लेकिन मुख्य मुकाबला बॉलीवुड के दो दिग्गज एक्टर्स के बीच ही था शत्रुघ्न सिन्हा और राजेश खन्ना।

भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस अपने अपने प्रत्याशियों के लिए पूरी ताकत झोंकने में लगी थी। राजेश खन्ना के लिए प्रचार करने वालों में प्रमुख नाम थे-आर के धवन, विद्या चरण शुक्ला और एचकेएल भगत।
शत्रुघ्न सिन्हा के लिए प्रचार करने वालों में बड़े नाम थे-उमा भारती , मदन लाल खुराना और विजय कुमार मल्होत्रा।

दोनों अभिनेताओं की पत्नियां, डिंपल कपाड़िया और पूनम सिन्हा , भी अपने पति के लिए मैदान में थी। वो अच्छी खासी भीड़ इकट्ठा कर रही थी।

चुनाव के परिणाम और टुट गयी पुरानी दोस्ती

इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ा। कांग्रेस के उम्मीदवार राजेश खन्ना को 101625 वोट मिले। भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी शत्रुघ्न सिन्हा को 73369 वोट ही मिले।
इस तरह से शत्रुघ्न सिन्हा,  राजेश खन्ना से 28, 256 वोटो के अंदर से अंतर से हार गए।

शायद राजेश खन्ना को यह उम्मीद नहीं थी की दोस्त शत्रुघ्न सिन्हा उनके खिलाफ चुनाव लड़ेंगे। यह बात राजेश खन्ना के दिल से लग गई और उन्होंने शत्रुघ्न सिन्हा से बात करना बंद कर दिया।

क्या हुआ राजेश खन्ना के राजनीतिक करियर का?

राजेश खन्ना राजनीति में एक लंबी पारी खेलना चाहते थे।वो इसके लिए खुद को तैयार भी कर रहे थे। लेकिन राजनीति में आने के बाद उन्हें एहसास हुआ कि उनका इस्तेमाल केवल चुनाव में भीड़ खींचने के लिए ही किया जा रहा है। राजेश खन्ना ने खुद को धीरे-धीरे राजनीति से दूर कर लिया। इस तरह से राजेश खन्ना का फुल टाइम पॉलीटिशियन बनने का सपना अधूरा रह गया।

शत्रुघ्न सिन्हा ने क्या कहा?

वे राजेश खन्ना के खिलाफ चुनाव लड़ने को अपने जीवन का सबसे बड़ा भूल करार दिया।

शत्रुघ्न सिन्हा ने कहा , ‘मैं अपने गाइड, गुरु, नेता और अभिभावक लालकृष्ण आडवाणी के कहने पर आया। मैं यह चुनाव नहीं लड़ना चाहता था लेकिन सीनियर लीडर के आग्रह पर मुझे चुनाव लड़ना पड़ा। उनहोंने  कहा, ‘इसके लिए मैंने अपने जीवन में कई बार डायरेक्टली ओर इनडायरेक्टली राजेश खन्ना से माफी भी मांगी।मैंने उनसे कहा कि मुझे किसी भी सूरत में अपने सक्रिय राजनीतिक जीवन का शुरुआत उपचुनाव से नहीं करना चाहिए था। आडवाणी जी की बातों को टाल नहीं सका। इस फैसले का मुझे जीवन भर पछतावा रहा। मैं तो चुनाव हार ही गया, साथ ही मैंने अपना एक दोस्त भी खो दिया।’

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