Sarvan Kumar 09/09/2022
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Last Updated on 09/09/2022 by Sarvan Kumar

मद्धेशिया (Madheshiya/Madhesiya) भारत में पाया जाने वाला एक समुदाय है. इन्हें मद्धेशिया वैश्य, मधेशिया बनिया, मध्यदेशीय वैश्य और मद्धेशिया कांदू समुदाय के नाम से भी जाना जाता है. इनका पारंपरिक व्यवसाय मिठाई बनाना और बेचना, व्यापार तथा मुख्य रसोईया (शेफ) के रूप में काम करना रहा है. इनमें से कुछ कृषि भी करते हैं. इस समुदाय के लोग अपनी लगन, त्याग, उच्चभाव, मृदुता, दया भावना और करुणा के लिए जाने जाते हैं. अपनी प्रतिभा और कड़ी मेहनत से इस समुदाय के लोगों ने विभिन्न क्षेत्रों में बहुमूल्य योगदान देकर देश को आगे ले जाने का काम किया है. इनके बारे में कहा जाता है कि अपनी व्यवसायिक दक्षता के कारण यह कचरे से भी सोना बनाने की क्षमता रखते हैं. अपने अच्छे स्वभाव और व्यवहार तथा कुशल व्यवसाई होने के कारण इस समुदाय के सदस्यों का समाज में हमेशा से सम्मान रहा है.आइए जानते हैं, मद्धेशिया जाति का इतिहास, मद्धेशिया शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई?

मद्धेशिया जाति का इतिहास

गुलामी के दौर से गुजरने के कारण अन्य समुदायों के तरह इस समुदाय को भी कई उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ा, जिससे इनके सामाजिक स्थिति में भी कई उतार-चढ़ाव आए. भारतीय समाज में धार्मिक अनुष्ठानों, सामाजिक आयोजनों, त्योहारों‌ तथा शादी विवाह आदि में मिठाइयों का विशेष महत्व है. सामाजिक और कर्मकांडीय के महत्व के कारण भी इस समुदाय के लोगों को समाज में सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है.कई लोग ऐसा मानते हैं कि मद्धेशिया वैश्य वस्तुत: कानू, कान्दू और हलवाई एक ही जाति है, जिनका मुख्य व्यवसाय मिठाई बनाना तथा भुजा भुजना है.

प्राचीन काल, मुगल कालीन , अंग्रेजों के शासन काल में लिखे गये कई ग्रन्थों और अभिलेखों में इस जाति समूह को कानू-कान्दू नाम से उल्लेख किया गया है. सन 1891 में जनगणना आयुक्त एच.एस.रिस्ले ने अपनी किताब में इस जाति समूह की व्याख्या की है‌ स्पष्ट रूप से उल्लेख किया है कि मद्धेशिया हलवाई/कान्दू का हीं उपविभाजन है. जमींदारी उन्मूलन अधिनियम ( 1959) में संशोधन से पहले इनमें से कई जमींदार थे जो बिहार आदि राज्यों में जमींदारी करते रहे थे.

मैथ्यू एटमोर शेरिंग (M. A. Sherring) ने अपनी किताब “Hindu Tribes and Castes As Represented in Benares” में मद्धेशिया समुदाय के बारे में निम्नलिखित बातों का उल्लेख किया है-

•शेरिंग ने मद्धेशिया को हलवाई जाति का एक उपविभाजन/उपजाति के रूप में वर्णित किया है.

•शेरिंग ने हलवाई को छोटे व्यापारी के रूप में संदर्भित किया है तथा तेली, दवा और इत्र विक्रेता,
स्पिरिट विक्रेता और भारभुंजा आदि के साथ वर्गीकृत किया है.

•शेरिंग ने हलवाई के बारे में लिखा है कि –
कई जातियां, विशेष रूप से वैसे जातियां, यहां तक कि ब्राह्मण भी मिठाइयों के निर्माण और बिक्री में कार्यरत हैं. फिर भी, बनारस प्रांत में, और निचले दोआब में, इस व्यवसाय में एक अलग जनजाति (हलवाई) लगी हुई है जो विभिन्न प्रकार की मिठाइयां बनाने में दक्ष हैं. हलवाई में 7 उपखंड हैं: कनौजिया, पचपिरिया, बौनीवाला
गोनर (Gaunr), मधेसिया, तिहारा और लखनावा.

सर हर्बर्ट होप रिस्ले (Sir Herbert Hope Risley) ने अपनी किताब “The Tribes and Castes of Bengal” में मद्धेशिया समुदाय को कांदू जाति की उपजाति बताया है. रिस्ले ने निम्नलिखित बातों का उल्लेख किया है-
गोरखपुर के कांदू को वैश्य माना जाता है. लेकिन इस संदर्भ में वैश्य शब्द का प्रयोग केवल व्यापारी के अर्थ में किया गया है‌ और प्रारंभिक भारतीय परंपरा में कांदू समुदाय के लिए वैश्य का कोई संदर्भ नहीं था.

•कांदू दुकानें रखते हैं और अक्सर मिठाइयां बनाते और बेचते हैं, जिसके कारण इन्हें हलवाइयों से भ्रमित किया जाता है, जो मिठाइयां बनाते हैं.

•कांदूओं को निम्नलिखित उप-जातियों में विभाजित किया गया है – मधेसिया, मघिया, बंतारिया या भरभुंजा, कनौजिया, गोनर, कोरंच, धुरिया, रवानी, ठेठर या ठठेरा इनमें से मधेशिया मिठाई बेचने के अपने वंशानुगत पेशे का सख्ती से पालन करते हैं.

मद्धेशिया शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई?

मद्धेशिया/मधेसिया दो संस्कृत शब्दों यानी “मध्य” और “देश” के संयोजन से बना है, जिसका अर्थ है -“देश के मध्य भाग से संबंधित”. इसीलिए इन्हें कभी-कभी “मध्यदेशीय या मध्यदेशीय वैश्य” भी कहा जाता है. एक अन्य मत के अनुसार, मधेशिया शब्द की उत्पत्ति “मध्य+एशिया” से हुई है जिसका अर्थ है- “मध्य एशिया के निवासी”. अर्थात इस समुदाय के लोग संभवत: मध्य एशिया से आकर नेपाल और उसकी तराई में बस गए और कालांतर में इन्हें “मधेशिया कानू या मधेशिया वैश्य” कहा जाने लगा.

मद्धेशिया कहां पाए जाते हैं?

ऐतिहासिक रूप से यह मध्य भारत से संबंधित हैं. लेकिन वर्तमान में इस समुदाय के सदस्य पूरे भारत में और यहां तक ​​कि विदेशों में भी पाए जाते हैं. भारत में अधिकांश मधेशिया बनिया पूर्वी उत्तरप्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल और असम में निवास करते हैं. बिहार के औरंगाबाद, अरवल, जहानाबाद, गया, समस्तीपुर, दरभंगा, मधुबनी, पश्चिमी और पूर्वी चंपारण, मुजफ्फरपुर, सीवान, पटना और भोजपुर जिलों में इनकी उपस्थिति है.

भाषा

यह अंगिका, हिंदी, बंगाली, भोजपुरी आदि बोलते हैं.

मद्धेशिया जाति के उपनाम (Surname)

मद्धेशिया वैश्य समुदाय के लोग कई उपनामों का प्रयोग करते हैं. इनके कुछ प्रमुख उपनाम इस प्रकार है- शाह, शॉ, साह, गुप्ता, प्रसाद, कानू, मधेसिया, सेठ, कन्नौजिया, राय बहादुर, अग्रवाल आदि.

मद्धेशिया किस धर्म को मानते हैं?

इस समुदाय के लोग सनातन हिंदू धर्म में आस्था रखते हैं तथा कई हिंदू देवी-देवताओं की पूजा करते हैं. वैश्य समाज के लोग सदा से संतों को पूजते रहे हैं. मद्धेशिया समुदाय के लोग लोकगीत साधु-संतों में ‌गहरी आस्था रखते हैं जैसे कि श्री बाबा गनीनाथ, श्री गोविंद जी, ब्रह्म बाबा, माता सती आदि. इस समुदाय के लोग संत शिरोमणि गणिनाथ जी की जयंती धूमधाम से मनाते हैं.


References;
•The Tribes and Castes of Bengal
Ethnographic Glossary · Volume 1
By Sir Herbert Hope Risley · 1892

•Hindu Tribes and Castes: Hindu tribes and castes as represented in Benares
By Matthew Atmore Sherring · 1872

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