Last Updated on 03/04/2023 by Sarvan Kumar
साहित्य की समाज के निर्माण में हमेशा से महत्वपूर्ण भूमिका रही है. साहित्य गद्य और पद्य की सभी विधाओं को संदर्भित करता है जिसमें कविता, शायरी, कहानी, उपन्यास, नाटक, आत्मकथा आदि शामिल हैं. साहित्य की उत्पत्ति समाज से ही होती है. कवि और लेखक समाज के पर्यवेक्षक और मार्गदर्शक की तरह होते हैं जो अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज को दिशा दिखाने का कार्य करते हैं, जिससे सामाजिक परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त होता है. इसी क्रम में हम यहां सेन समाज की शायरी के बारे में जानेंगे.
सेन समाज की शायरी
सेन/नाई समुदाय का अपना एक गौरवशाली इतिहास रहा है. नंद वंश की स्थापना महापद्मनंद ने की थी जो नाई जाति से आते थे. नाई भारत में रहने वाली एक ऐसी जाति है जिसके बिना समाज में किसी का काम नहीं चल सकता. हिन्दू समाज में उनकी भूमिका केवल बाल काटने तक ही सीमित नहीं है. प्राचीन काल से, उन्होंने हिंदू धार्मिक अनुष्ठानों में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. वैवाहिक संबंध तय करवाने से लेकर निमंत्रण देने तक का काम सेन समाज ही करता रहा है. इस समुदाय के लोगों ने हमेशा समाज को जोड़ने का काम किया है. जननायक कर्पूरी ठाकुर का जन्म भी नाई जाति में हुआ था जो राजनीति में गरीबों और दबे-कुचले वर्ग की आवाज बनकर उभरे थे.
वर्तमान परिस्थितियों की बात करें तो सेन/नाई समाज अपने गौरवशाली अतीत और अपने समाज के महापुरुषों को भूल चुका है. समाज में एकता की कमी है और यह समुदाय आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक और राजनीतिक रूप से हाशिए पर है. हालांकि अब इस समुदाय के लोग भी जागरूक होने लगे हैं और खुद को सशक्त बनाने की कोशिश कर रहे हैं. साहित्य एक सशक्त माध्यम है, जो समाज को व्यापक रूप से प्रभावित करता है. सेन समाज की शायरी के माध्यम से इस समुदाय के लोगों को अपने गौरवशाली इतिहास और महापुरुषों के जीवन चरित्र को बताकर नाई समाज में जोश और साहस भरने और उन्हें आत्मगौरव की अनुभूति कराने का प्रयास किया जाता रहा है ताकि इस समुदाय का नवनिर्माण किया जा सके.
यहां हम सेन समाज से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण शायरी के बारे में बता रहे हैं-
•चमकते सितारे हैं, अंधेरी रात नहीं
सेन कुल में जन्म लिया है, कोई छोटी मोटी बात नहीं
•शेर मर गए लड़ते-लड़ते, गीदड़ बन गए राजा
सैण समाज में आवश्यकता हो रही, मेरे महापद्मनंद अब आजा
•सैनो ने राज कर रखा, यूं ही नहीं शासन में आए
हर बलिदान दे रखा, तब जाकर नंदवंशी कहलाए
•रणभूमि में अलग नाम से जाने जाते हैं,
सम्राट महापद्मनंद के वंशज वर्तमान में नाई, शर्मा, सेन के नाम से जाने जाते हैं
•यहां पर कर्पूरी ठाकुर की दो पंक्तियों का उल्लेख करना जरूरी है. कर्पूरी ठाकुर क्या करते थे-
हक चाहिए तो लड़ना सीखो,
कदम-कदम पर अड़ना सीखो
