Ranjeet Bhartiya 11/04/2022
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Last Updated on 11/04/2022 by Sarvan Kumar

(Featured image: Pexels – only Representative) of बिरहोर/बिरहुल (Birhor/Birhul भारत में पाई जाने वाली एक आदिवासी जनजाति है. पारंपरिक रूप से यह एक खानाबदोश (nomadic) जनजाति है. जातीय रूप से, यह संथाल, मुंडा और हो के समान हैं. स्थानीय लोगों द्वारा इन्हें अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है. उदाहरणार्थ, कालाहांडी और सुंदरगढ़ जिलों में इन्हें मनकीड़ी (Mankidi), जबकि मयूरभंज और संबलपुर जिलों में मनकीरडिया (Mankirdia) के नाम से जाना जाता है. बिरहोर को, मनकीड़ी या मनकीरडिया कहने का कारण यह है कि ये बंदरों को पकड़ने में कुशल होते हैं. जब बंदर ग्रामीण इलाकों में तबाही मचाते हैं और फसलों, फलों और सब्जियों को नष्ट कर देते हैं, तो स्थानीय लोग बंदरों को पकड़ने के लिए बिरहोरों की सेवाएं लेते हैं. आइए जानते हैैं बिरहोर जनजाति का इतिहास, बिरहोर की उत्पति कैसे हुई?

बिरहोर जनजाति एक परिचय

बिरहोर जनजाति के लोग गांव में अन्य जनजातियों से कुछ दूरी पर जंगल के किनारे पहाड़ी इलाकों में निवास करते हैं. इनका मुख्य कार्य शिकार करना, जंगली और जड़ वाली सब्जियों और जंगली उत्पादों को इकट्ठा करना है. यह मोहलाइन की छाल की रस्सी और बांस के टुकड़ों की टोकरी बेचते हैं  पहले यह जंगली जानवरों जैसे हिरण, खरगोश, लोमड़ी, सियार, बंदर और पक्षियों का शिकार करते थे . रॉबर्ट वेन रसेल (R.V. Russell) ने इन्हें एक कोलेरियन जनजाति (Kolarian tribe) के रूप में वर्णित किया है

बंगाल प्रेसीडेंसी की जनजातियों और जातियों पर व्यापक अध्ययन करने वाले ब्रिटिश नृवंशविज्ञानी और भारतीय सिविल सेवा के सदस्य सर हर्बर्ट होप रिस्ले (Herbert Hope Risley) के अनुसार; बिरहोर पेड़ों और पत्तियों की शाखाओं से बनी छोटी-छोटी झोंपड़ियों में रहते हैं. यह खरगोशों और बंदरों को फँसाकर और जंगल के उत्पादों; विशेष रूप से चोब लता की छाल जिससे एक प्रकार की रस्सी बनाई जाती है; को इकट्ठा करके जीवन यापन करते हैं. यह बंदरों और अन्य छोटे जानवरों को पकड़ने में बहुत माहिर हैं, और उन्हें जिंदा बेच देते हैं या खा जाते हैं.

वर्तमान परिस्थिति (कैटेगरी): भारत सरकार के सकारात्मक भेदभाव की व्यवस्था आरक्षण के अंतर्गत इन्हें झारखंड, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, बिहार और मध्य प्रदेश में अनुसूचित जनजाति (Schedule Tribe, ST) के रूप में वर्गीकृत किया गया है. छत्तीसगढ़ में इन्हें विशेष पिछड़ी जनजाति समूह (Particularly Vulnerable Tribal Group, PVTG) के रूप में सूचीबद्ध किया गया है (b).

पॉपुलेशन, कहां पाए जाते हैं?: यह मुख्य रूप से झारखंड में पाए जाते हैं. छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, बिहार और मध्य प्रदेश में भी इनकी आबादी है. झारखंड में यह मुख्य रूप से के हजारीबाग, रांची, लोहरदगा, पलामू, गढ़वा, धनबाद, सिंहभूम और गिरिडीह और गुमला जिलों में पाए जाते हैं . छत्तीसगढ़ में यह मुख्य रूप से जशपुर, कोरबा और बिलासपुर जिलों में निवास करते हैं.

भाषा: यह हिंदी और बिरहोर भाषा बोलते हैं. बिरहोर भाषा
ऑस्ट्रोएशियाटिक भाषा परिवार की भाषाओं के मुंडा समूह से संबंधित है.

बिरहोर किस धर्म को मानते हैं?

धार्मिक रूप से यह अपने पारंपरिक मान्यताओं और हिंदू धर्म का पालन करते हैं. सिंगबोंगा (सूर्यदेव) इनके सर्वोच्च देवता है और धरती मां उनकी पत्नी हैं. इसके अलावा इनके द्वारा महादेव, काली माई, बुरहा, बुरु बोंगा और बंगा कुलों के देवताओं, बूढ़ी माई, मेरी माई, पूर्वज पर्वत, वृक्ष आदि की भी पूजा की जाती है . यह भूत प्रेत और काला जादू में विश्वास करते हैं. स्थानीय जनजातियों के लोग बिरहोर जाति को टोना-टोटका विशेषज्ञ मानते हैं. इनमें से कुछ धर्म परिवर्तित करके ईसाई बन गए हैं. ईसाई के रूप में यह चर्च जाते हैं और ईसाई त्यौहारों को मनाते हैं. इनके प्रमुख त्यौहार हैं- नवाखानी, दशहरा, दिवाली, होली, सिरहुल, काली पूजा, करमा, सोहराई और फागुआ .

बिरहोर जनजाति का उप-विभाजन

सामाजिक-आर्थिक स्थिति के अनुसार बिरहोरों को दो समूहों में वर्गीकृत किया गया है. खानाबदोश जीवन व्यतीत करने वाले घुमंतू बिहोर को उथलू कहा जाता था, जो शिकार और कंदमूल की खोज में अस्थाई निवास बनाकर जंगलों में घूमते थे. स्थाई रूप से कुटिया बनाकर गांव के समीप रहने वाले जघीश या जगी बिरहोर कहलाते हैं  इस जनजाति में कई बहिर्विवाही गोत्र पाया जाता है. इनके प्रमुख गोत्र हैं- सोनियल, गोतिया, बंदर गोतिया, बघेल, बाड़ी, कछुआ, छतोर, सोनवानी और मुरिहार आदि.

बिरहोर जनजाति का इतिहास

मुंडारी भाषा में “बीर” का अर्थ होता है- “जंगल या झाड़ी” और “होर” का अर्थ होता है- “मनुष्य”. इस प्रकार से “बिरहोर” का अर्थ होता है- “जंगल में रहने वाला आदमी”.  या झाड़ी काटने वाला आदमी हो सकता है  बिरहोर जनजाति की उत्पत्ति के संबंध में कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलता है. इन्हें कोलारियन समूह की जनजाति माना जाता है.ब्रिटिश मानव विज्ञानी और प्रशासक कर्नल डाल्टन (Colonel Dalton) ने बिरहोरों को खारिया जनजाति की एक शाखा माना है.

बिरहोर जनजाति की उत्पति कैसे हुई?

इनकी उत्पत्ति से जुड़ी एक प्रचलित किवदंती के अनुसार, यह सूर्य देव से अपनी उत्पत्ति का दावा करते हैं. इनकी मान्यताओं के अनुसार, सूर्य देव के द्वारा सात भाइयों को जमीन पर गिराया गया था, जो खैरागढ़ (कैमूर पहाड़ी) से आए थे. इनमें से चार भाई पूर्व दिशा में गए और तीन भाई रायगढ़ जशपुर की पहाड़ी में रह गए. एक दिन तीन भाई देश के राजा के साथ युद्ध करने के लिए निकले तो उनमें से एक भाई के सिर का कपड़ा पेड़ में अटक गया. इसे अशुभ संकेत मानकर वह जंगल में चला गया और जंगल की घनी कटीली झाड़ियों को काटने लगा. शेष दो भाई राजा के साथ युद्ध करने गए और उसे युद्ध में पराजित कर दिया. जब वे लौट रहे थे तो उन्होंने अपने भाई को “चोप” (झाड़ी) काटते हुए देखा और उसे बिरहोर (जंगल का आदमी) कहना शुरू कर दिया.इस पर उसने गर्व से कहा, “हाँ मैं बिरहोर हूँ” और वह व्यक्ति जंगल में रहने लगा. उसके वंशज भी बिरहोर कहलाने लगे.


References;

(a). Book Title: The Tribes and Castes of the Central Provinces of India–Volume I (of IV)
Author: R.V. Russell

(b). http://cgtrti.gov.in/PVTG.html

(c ). https://www.ethnologue.com/language/biy

(d). https://www.scstrti.in/

(e).
https://web.archive.org/web/20090327120003/http://www.jharkhandi.org/birhor_tribe.htm

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