Last Updated on 06/12/2022 by Sarvan Kumar
ब्रह्मर्षि वंश विस्तार (BrahamRishi vansh vistar) स्वामी सहजानंद सरस्वती द्वारा लिखित एक प्रसिद्ध ग्रंथ है. विपुल लेखक, समाज सुधारक और क्रांतिकारी स्वामी सहजानंद सरस्वती का जन्म उत्तर प्रदेश प्रांत के गाजीपुर जिले में एक भूमिहार ब्राह्मण परिवार में हुआ था. यहाँ हम उन घटनाओं के क्रम के बारे में जानेंगे जिनके कारण इस पुस्तक का लेखन हुआ. इसके साथ ही हम यह भी जानेंगे कि इस पुस्तक की विषय वस्तु क्या है.
ब्रह्मर्षि वंश विस्तार पुस्तक
ब्रह्मर्षि शब्द हाल ही में भूमिहार जाति के पर्याय के रूप में प्रचलन में आया है. हालाँकि, यहाँ यह उल्लेख करना महत्वपूर्ण है कि ब्रह्मऋषि समाज एक व्यापक समूह को संदर्भित करता है और इसमें अयाचक ब्राह्मणों के कई घटक समूह शामिल हैं जैसे कि त्यागी, गालव, भूमिहार, मोहियाल, चित्तपावन आदि. भूमिहारों के सन्दर्भ में ब्रह्मर्षि शब्द का सर्वप्रथम उल्लेख स्वामी सहजानंद सरस्वती की सन् 1915 में प्रकाशित पुस्तक ब्रह्मर्षि वंश विस्तार में मिलता है. 1889 में मुजफ्फरपुर में आयोजित प्रथम भूमिहार ब्राह्मण महासभा में स्वर्गीय लंगट सिंह के नेतृत्व में भूमिहारों को ब्राह्मण के रूप में मान्यता देने के लिए एक संगठित आवाज उठाई गई थी. 1901 की जनगणना में भूमिहारों को गैर-ब्राह्मणों के रूप में घोषित करने से उनकी आत्म-पहचान के लिए आक्रमक आंदोलन को बढ़ावा मिला. पहचान आंदोलन की दो धाराएँ थीं- एक का नेतृत्व सर गणेश दत्त ने किया और दूसरे का स्वामी सहजानंद सरस्वती ने. बाद में 1915 में, स्वामी सहजानंद सरस्वती ने बलिया (यूपी) में भूमिहार ब्राह्मण महासभा में इस मुद्दे को उठाया और ब्राह्मणों के रूप में उनकी मान्यता के लिए संघर्ष किया. इस किताब के लिखे जाने के पीछे एक दिलचस्प कहानी है. स्वामी सहजानंद सरस्वती को जानने वाले कुछ भूमिहारों ने उनसे अनुरोध किया कि यदि वे भूमिहारों के इतिहास से संबंधित पुस्तक लिखते हैं, तो यह समाज के लिए एक बड़ा उपकार होगा. इस पर स्वामी जी ने हामी भर दी. उन्होंने सोचा कि वह इस विषय पर “भूमिहार ब्राह्मण परिचय” नामक एक छोटी सी पुस्तक लिखेंगे. लेकिन जब उन्होंने इस पुस्तक को लिखने के लिए शोध करना शुरू किया तो उन्हें लगा कि ब्राह्मण के इतिहास और धर्म पर प्रकाश डालना आवश्यक है. इस प्रकार यह ग्रंथ विस्तृत हो गया और “ब्रह्मर्षि वंश विस्तार” के नाम से अस्तित्व में आया.इस पुस्तक में ब्राह्मण धर्म, अयाचक ब्राह्मणों के विशेषण, आचार-व्यवहार, विवाह सम्बन्ध, उपाधियाँ या पदवियाँ आदि के माध्यम से भूमिहार जाति के इतिहास के बारे में विस्तार से बताया गया है. Flipkart पर ब्रह्मर्षि वंश विस्तार पुस्तक उपलब्ध है.
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References:
•ब्रह्मर्षि वंश विस्तार,
रचनाकार- स्वामी सहजानंद सरस्वती
•https://timesofindia.indiatimes.com/city/patna/rishis-maharshis-brahmarshis-/articleshow/39109373.cms
