Sarvan Kumar 10/03/2024
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Last Updated on 10/03/2024 by Sarvan Kumar

भारत में मुगल काल और ब्रिटिश शासन के दौरान हमारा देश छोटी-छोटी रियासतों और जमींदारियों में बंटा हुआ था। 15 अगस्त 1947 यानी भारत की आज़ादी तक, लगभग सभी रियासतों का भारत में विलय हो गया। इसी प्रकार भारत की आजादी के बाद जमींदारी प्रथा को भी कानून बनाकर समाप्त कर दिया गया। ‌अब राजा-रजवाड़े और जमींदारियां तो नहीं रहे, लेकिन उनके द्वारा बनवाए गए ऐतिहासिक भवन, मंदिर, महल और किले आज भी उनके स्वर्णिम और गौरवशाली इतिहास की गवाही देते हैं। बिहार के गोपालगंज जिले के हथुआ कस्बे में स्थित हथुआ राज पैलेस एक ऐसी ऐतिहासिक इमारत है जो हथुआ रियासत और भूमिहार समाज के ऐतिहासिक महत्व और गौरवशाली इतिहास के प्रतीक के रूप में खड़ी है। इसी क्रम में यहां हम हथुआ राज के बारे में जानेंगे।

हथुआ राज

मुगल काल और ब्रिटिश शासन के दौरान, बिहार में कई महत्वपूर्ण रियासतें और जमींदारियाँ उभरीं, जिनमें प्रमुख थीं मुरहो एस्टेट, बेतिया राज, टेकारी राज, डुमराँव राज, दरभंगा राज, आदि। इन रियासतों और जमींदारियों में आर्थिक, प्रशासनिक और सैन्य शक्तियाँ होती थीं और ये स्वायत्त या अर्ध-स्वायत्त शासकों और प्रशासकों के रूप में कार्य करते थे। यहां यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि प्रत्येक जमींदारी की अपनी स्थायी सेना होती थी जो आमतौर पर उसके अपने कुलों से बनी होती थी। इनमें से अधिकांश जमींदार आम तौर पर भूमिहार, राजपूत, मैथिल ब्राह्मण, कुर्मी, कायस्थ जैसी हिंदू जातियों से थे। इसके अलावा कई मुस्लिम जमींदार भी थे।

हथुवा राज या हथुवा स्टेट की बात करें तो यह भूमिहार ब्राह्मणों का प्रसिद्ध रियासत था। आपको बता दें कि भूमिहार ब्राह्मण उत्तर बिहार और पूर्वांचल की एक प्रसिद्ध जाति है जो अपनी बुद्धिमत्ता, वीरता, बलिदान, ऐतिहासिक महत्व और स्वर्णिम इतिहास के लिए जानी जाती है। बिहार में छोटी आबादी के बावजूद भूमिहारों का लगभग हर क्षेत्र में दबदबा है और उनकी गिनती राज्य की सबसे प्रभावशाली जातियों में होती है।

हथुआ राज (प्रारंभिक-मध्यकाल-1952) भूमिहारों के बघोचिया राजवंश से संबंधित एक जमींदारी थी जो प्रारंभिक मध्ययुगीन काल में उभरी थी। इसकी राजधानी कल्याणपुर थी। बघोचिया राजवंश को वत्स गोत्र भूमिहार ब्राह्मणों का एक उपसमूह माना जाता है। यह रियासत बहुत बड़े क्षेत्र में फैली हुई थी। ‌ इसमें बिहार के सारण डिवीजन के 1,365 गांव शामिल थे और इसमें 391,000 से अधिक लोग रहते थे, जिससे लगभग दस लाख रुपये की पर्याप्त वार्षिक किराये की आय होती थी।

इतिहास:

हथुअवा राज के उदय की कहानी बड़ी दिलचस्प है. •कल्याणपुर के भूमिहार शाही परिवार का पहला उल्लेख 1539 में मिलता है। चौसा की लड़ाई आधुनिक बिहार में बक्सर से 10 मील दक्षिण पश्चिम में 26 जून 1539 को अफगान सरदार शेर शाह सूरी और मुगल सम्राट हुमायूँ के बीच लड़ी गई थी। इस युद्ध में शेरशाह सूरी की जीत हुई और मुगल बादशाह हुमायूं को अपनी जान बचाने के लिए युद्ध का मैदान छोड़ना पड़ा। ‌

•हुमायूँ कई दिनों तक भटकता रहा लेकिन शेरशाह सूरी के डर से कोई भी शरण नहीं दे रहा था। ऐसी कठिन स्थिति में भूमिहार राजा जयमल ने हुमायूँ को आश्रय देने का साहस दिखाया। उन्होंने हुमायूँ और उसके सैनिकों आश्रय, भोजन और चारा उपलब्ध कराया। इससे शेरशाह सूरी क्रोधित हो गया और जब सम्पूर्ण दक्षिण भारत पर उसकी सत्ता स्थापित हो गयी तो उसने राजा जयमल के विरुद्ध कार्यवाही की। परिणामस्वरूप राजा जयमल को अपना राज्य छोड़कर जंगल में शरण लेनी पड़ी। लेकिन इससे राजा जयमल भयभीत नहीं हुए, उन्होंने शेरशाह सूरी के विरुद्ध विद्रोह जारी रखा।

•23 जुलाई 1555 को हुमायूँ को एक बार फिर दिल्ली की गद्दी पर बैठने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। वह भूमिहार राजा जयमल के उपकारों को नहीं भूले और उनकी वीरता तथा वफादारी से प्रसन्न होकर जयमल के पोते राजा जुबराज शाही को चार परगने दे दिये और इस तरह हथुआ रियासत अस्तित्व में आई।

हथुआ राज का उदय केवल मध्यकालीन भारत में घटी एक राजनीतिक घटना नहीं है, बल्कि यह भूमिहार समाज की दृढ़ता, साहस, निष्ठा और वीरता की एक अमर कहानी है जो अनंत काल तक भूमिहार समाज को उसके गौरवशाली इतिहास की याद दिलाती रहेगी।

References:

•Yang, Anand A. (1999). Bazaar India: Markets, Society, and the Colonial State in Bihar. University of California Press. pp. 305 (at page 69). ISBN 978-0-520-21100-1.

•Tahir Hussain Ansari (20 June 2019). Mughal Administration and the Zamindars of Bihar. Taylor & Francis. pp. 288–293. ISBN 978-1-00-065152-2.

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