Last Updated on 09/10/2022 by Sarvan Kumar
जीवन एक ऐसी यात्रा है जो जन्म के साथ शुरू होती है और मृत्यु के साथ खत्म हो जाती है. हिंदू धर्म के सिद्धांतों के अनुसार मृत्यु से केवल शरीर का नाश होता है, जबकि आत्मा की यात्रा तो अनंत है. साधु संतों के बारे में कहा गया है कि मृत्यु के बाद वह ईश्वर या अपने आराध्य में एकाकार हो जाते हैं. इसी क्रम में आइए जानते हैं संत रविदास के मृत्यु के बारे में.
संत रविदास के मृत्यु
संत रविदास जी मध्य काल के एक महान कवि, संत और समाज सुधारक थे. उन्होंने अपना सारा जीवन समाज में फैली भ्रांतियों और कुरीतियों को दूर करने के लिए समर्पित कर दिया. उन्होंने समाज में व्याप्त जात-पात, ऊंच-नीच, वर्ण-भेद, ब्राह्मणवाद और धार्मिक पाखंड के विरुद्ध आवाज उठाई और धर्म को सबके लिए सुलभ बनाने का कार्य किया. जहां तक संत रविदास जी की मृत्यु का प्रश्न है, इसके बारे में दो मत हैं. एक मत के अनुसार उनकी हत्या की गई थी. जबकि दूसरे मत के अनुसार उनकी मृत्यु वृद्धावस्था के कारण हुई थी.
क्या संत रविदास जी की हुई थी हत्या?
प्रथम मत के अनुसार, गुरु रविदास ने जाति विभाजन के खिलाफ आवाज उठाई और सामाजिक एकता के लिए इस कुरीति को दूर करने करने का आह्वान किया. रविदास जी का जन्म चर्मकार जाति में हुआ था, जिसे उस वक्त अछूत माना जाता था. परिणामस्वरूप रविदास जी को भी कई प्रकार के अत्याचारों का सामना करना पड़ा. जाति व्यवस्था, अस्पृश्यता प्रथाओं और जाति आधारित सख्त प्रतिबंधों के कारण निम्न वर्ग के लोगों का जीवन कठिन हो गया था. अपने पूरे जीवन में गुरु रविदास जातिवादी वर्चस्व के खिलाफ लड़ते रहे और समानता के लिए आवाज उठाते रहे. उन्होंने धार्मिक और आध्यात्मिक गतिविधियों पर ध्यान केंद्रित किया और समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने के लिए कई भजनों और दोहों की रचना की. उनके कार्यों का तत्कालीन समाज और भक्ति आंदोलन पर बहुत प्रभाव पड़ा. समाज के तथाकथित उच्च वर्ग और पुरोहित वर्ग में रविदास जी के प्रति काफी आक्रोश था, जिसके कारण चित्तौड़गढ़ में गुरु रविदास की हत्या कर दी गई. उस समय उनकी उम्र 151 साल थी.
रविदास जी की स्वाभाविक हुई थी मृत्यु?
दूसरे मत के अनुसार, रविदास जी की मृत्यु 1544 ईस्वी में राजस्थान में हुई थी. रविदास जी के मृत्यु के संबंध में एक पद का उल्लेख मिलता है, जो इस प्रकार है-
“पन्द्रह सौ चौरासी भई चितौर महभीर।
जर – जर देह कंचन भई रवि मिल्यौ सरीर।।”
अधिकांश विद्वान इस मत को स्वीकार करते हैं. इस पद से प्रतीत होता है कि रविदास जी का शरीर बहुत बूढ़ा, कमजोर और जर्जर हो गया था. और वृद्धावस्था के कारण चित्तौड़ में स्वाभाविक रूप से उनकी मृत्यु हो गई.
References;
•Mahakavi Ravidas Samaj Chetna Ke Agradut
By Dr. Vijay Kumar Trisharan · 2008
•Reference: ‘Guru Ravidas Ki Hatya Ke Parmanik Dastawez’ by Satnam Singh
