Ranjeet Bhartiya 01/02/2022
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Last Updated on 01/02/2022 by Sarvan Kumar

1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कई मायनों में भारतीय इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है. इस आंदोलन की एक खास बात यह थी कि इसमें महिलाओं ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया था.जब बात देश की आई  तो महिलाओं ने अपनी चूड़ियां उतारकर हाथों में बंदूक थाम लिया और ना केवल रणभूमि में अंग्रेजों से डटकर मुकाबला किया बल्कि अपने मातृभूमि की रक्षा के लिए त्याग और बलिदान देकर इतिहास में अपना नाम अमर कर लिया. इस स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी महत्वपूर्ण वीरांगनाओं जैसे रानी लक्ष्मीबाई और बेगम हजरत महल के बारे में तो सभी जानते हैं, लेकिन बहुत कम लोग यह जानते हैं कि इस आंदोलन में दलित और पिछड़ी जातियों से आने वाली महिलाओं ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. अवंती बाई, पन्नाध्याय और उदा देवी जैसी वीरांगनाओं का बलिदान हम नहीं भुला सकते. लेकिन जाति विशेष के मुख्यधारा के इतिहासकारों ने ऐतिहासिक दस्तावेजों में उनका स्थान नहीं दिया. इन वीरांगनाओं के बारे में या तो बिल्कुल भी नहीं लिखा गया  या बहुत कम लिखा है. हमें दलित और पिछड़ी जातियों के एक्टिविस्ट, पत्रकार और साहित्यकारों का एहसानमंद होना चाहिए जिन्होंने अपने व्यक्तिगत प्रयासों से छोटे-छोटे पुस्तकों को लिखकर अतीत में दफन महत्वपूर्ण तथ्यों को उजाले में लाने का प्रयास किया. और वर्षों से अंधेरे में दबे गुमनाम नायकों और नायिकाओं से हमारा परिचय करवाया. इसी कड़ी में एक नाम आता है झलकारी बाई का. झलकारी बाई झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की नियमित सेना में, महिला शाखा दुर्गा दल की सेनापति थीं; जिन्होंने 1857 के भारतीय विद्रोह में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. इसके अलावा, वह लक्ष्मीबाई के साथ युद्ध के विश्लेषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली रानी की एक करीबी विश्वासपात्र और सलाहकार थीं. रानी लक्ष्मीबाई की हमशक्ल होने के कारण वह दुश्मन सेना को गुमराह करने के लिए रानी के वेश में युद्ध किया करती थीं. अपने अंतिम समय में भी वह ‌रानी के भेष में बहादुरी से युद्ध करते हुए अंग्रेजों द्वारा पकड़ी गई थी. लेकिन गिरफ्तार होने से पहले उन्होंने रानी लक्ष्मी बाई को किले से बाहर सुरक्षित निकलने का अवसर दिया था. प्रथम स्वाधीनता संग्राम में झाँसी की रानी के साथ ब्रिटिश सेना के विरुद्ध अद्भुत वीरता से लड़ते हुए ब्रिटिश सेना के कई हमलों को विफल किया था. आज भी यह बुंदेलखंड की लोकगाथाओं और लोकगीतों में सुनी जा सकती हैैं.आइए जानते हैं झलकारी बाई की मृत्यु कैसे हुई? कोली समाज की वीरांगना झलकारी की अमर कहानी.

झलकारी बाई का जन्म कब हुआ?

झलकारीबाई (Jhalkaribai) का जन्म 22 नवंबर 1830 को झांसी के नजदीक भोजला गाँव में एक साधारण से निर्धन कोली परिवार में हुआ था. भोजला गाँव झांसी से लगभग 4 कोस की दूरी पर स्थित है. इनके पिता का नाम सदोवर सिंह और माता का नाम जमुना देवी था. झलकारीबाई अपने माता-पिता की इकलौती संतान थीं. झलकारी बाई बहुत छोटी थीं तब उनकी माता की मृत्यु हो गई. मां की मृत्यु के बाद इनके लालन-पालन का सारा दायित्व इनके पिता पर आ गया. पिता खुले और प्रगतिशील विचारों के थे. उस समय सामाजिक परिस्थितियां इस प्रकार थी कि लड़कियां औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकती थीं. फिर भी पिता ने उन्हें एक लड़के की तरह पाला पोसा और घुड़सवारी और हथियारों का प्रयोग करने में प्रशिक्षित किया. पिता के सहयोग से झलकारी बाई ने खुद को एक उत्कृष्ट योद्धा के रूप में विकसित किया.

जब बाघ को मार गिराया

झलकारी बाई बचपन से ही बहुत साहसी, निडर, बहादुर और दृढ़ प्रतिज्ञ बालिका थीं. स्वभाव से यह काफी हाजिर जवाब थी और बड़े-बड़े सपने देखा करती थीं. युवा अवस्था तक आते-आते भोजला गाँव और आसपास के इलाकों में झलकारी बाई के निडरता और बहादुरी के चर्चे होने लगे. बुंदेलखंड में झलकारी बाई के कई कहानियां प्रचलित हैं. कहा जाता है कि झलकारी बाई जब अपनी युवावस्था में ही थीं तब एक बाघ ने उन पर हमला कर दिया. बाघ द्वारा हमला किए जाने के बावजूद भी झलकारी बाई तनिक भी विचलित नहीं हुईं और दृढ़ता से खड़ी रही. अविश्वसनीय साहस का परिचय देते हुए उन्होंने ना केवल बहादुरी से बाघ का सामना किया, बल्कि उसे  कुल्हाड़ी से मार गिराया. जब झलकारी बाई थोड़ी बड़ी हुई तो घर का काम करने लगीं. इसके अलावा वह पशुओं का देखभाल तथा जंगल से लकड़ी इकट्ठा करने का भी काम करती थीं. यह दावा किया जाता है कि एक बार झलकारी बाई लकड़ी इकट्ठा करने के लिए जंगल गई, जहां उनकी भिड़ंत एक खतरनाक तेंदुए से हो गई. झलकारी बाई ने फिर बहादुरी और साहस का परिचय देते हुए अपनी कुल्हाड़ी से उस तेंदुए को मार गिराया था. कहीं-कहीं यह भी दावा किया जाता है कि झलकारी बाई ने तेंदुए को कुल्हाड़ी से नहीं बल्कि एक छड़ी से मारा था, जिसका प्रयोग वह मवेशियों को चराने के लिए करती थीं. इसी तरह से एक अन्य अवसर पर डकैतों के गिरोह ने गांव के एक व्यवसायी पर हमला किया. वह व्यापारी को लूटना चाहते थे. झलकारी बाई डकैतों के गिरोह के सामने भी नहीं घबरायी और अपने साहस और बहादुरी से उन्हें पीछे हटने पर मजबूर कर दिया.

झलकारी बाई का विवाह

जब झलकारी बाई बड़ी हुई तो पिता को उनकी शादी की चिंता सताने लगी. लड़की बहादुर थी तो लड़का भी बहादुर चाहिए था. गांव वाले भी झलकारी बाई के बहादुरी से प्रभावित थे. झलकारी बाई के बहादुरी से प्रसन्न होकर गांव वालों ने उनका विवाह पूरन कोरी नाम के एक युवक से करवा दिया. पूरन कोरी रानी लक्ष्मीबाई की सेना में सैनिक थे. रानी की पूरी सेना पूरन के साहस, वीरता और पराक्रम का लोहा मानती थी.

लक्ष्मी बाई की हमशक्ल और सेना में भर्ती

एक बार गौरी पूजा के अवसर पर झलकारी बाई गांव की अन्य महिलाओं के साथ रानी लक्ष्मी बाई को सम्मान देने तथा उनके प्रति अपना निष्ठाभाव प्रदर्शित करने झांसी के किले में गईं. यहीं पर लक्ष्मीबाई और झलकारी बाई की पहली मुलाकात हुई. जब रानी लक्ष्मीबाई ने झलकारी बाई को देखा तो वह आश्चर्यचकित रह गईं.

महारानी लक्ष्मी बाई और झलकारी बाई  (Left Photo : Wikimedia Commons 

झलकारी बाई बिल्कुल रानी लक्ष्मीबाई की तरह दिखती थीं. जब अन्य औरतों ने झलकारी बाई की साहस और बहादुरी की कहानी सुनाई तो रानी लक्ष्मी बाई बहुत प्रभावित हुईं. उन्होंने झलकारी बाई को अपनी सेना के महिला विंग दुर्गा दल में शामिल होने का आदेश दिया. दुर्गा दल में शामिल होने के बाद झलकारी बाई को अन्य महिलाओं के साथ हथियार चलाने का प्रशिक्षण दिया गया जिसमें बंदूक चलाना, तोप चलाना और तलवारबाजी आदि शामिल था. ऐसा कहा जाता है कि रानी लक्ष्मीबाई और झलकारी बाई में अलौकिक समानता होने के कारण ही उन्हें झांसी की सेना के महिला विंग में शामिल किया गया था. झलकारी बाई उन चंद सौभाग्यशाली लोगों में थीं जिन्हें रानी लक्ष्मीबाई ने स्वयं घुड़सवारी, धनुर्विद्या, तलवारबाजी, कुश्ती तथा अन्य शारीरिक व्यायामों की कला में प्रशिक्षित किया था. अपने साहस, वीरता, नेतृत्व क्षमता, युद्ध की रणनीति बनाने और समझने की अद्भुत क्षमता और वफादारी के कारण वह शीघ्र ही दुर्गा दल की सेनापति तथा रानी लक्ष्मीबाई की विश्वासपात्र सहायक और सलाहकार बन गईं.

झलकारी बाई की मृत्यु कैसे हुई ?

यह बात उस समय की है जब भारतीय रियासतों पर अंग्रेजों की दखलअंदाजी बढ़ती जा रही थी. इसके कारण चारों तरफ अफरा तफरी का माहौल था. ब्रिटिश छल, प्रपंच और शक्ति के बल पर भारतीय रियासतों को अपने अधीन कर लेना चाहते थे. झांसी पर भी अंग्रेजों की इस दमनकारी और विस्तारवादी महत्वाकांक्षा की दस्तक हो चुकी थी. अंग्रेजों ने झांसी पर कब्जा करने की मंशा से रानी लक्ष्मी बाई के दत्तक पुत्र को उनका उत्तराधिकारी मानने से इनकार कर दिया. 1857 के विद्रोह के दौरान, जनरल ह्यू रोज (General Hugh Rose) ने एक बड़ी सेना के साथ झांसी पर आक्रमण कर दिया. अंग्रेजों की इस नापाक हरकत के खिलाफ झांसी की सेना, उसके सैनिक और सेनानायक तथा झांसी के आम लोग, जिनमें बूढ़े, बच्चे, जवान और महिलाएं भी शामिल थीं, रानी लक्ष्मी बाई के साथ लामबंद हो गए. आत्मसमर्पण करने के बजाय उन्होंने अपनी मातृभूमि और मान सम्मान की रक्षा के लिए अंग्रेजों के खिलाफ हथियार उठाने का संकल्प लिया. अप्रैल 1857 में अंग्रेजी फौज और झांसी की सेना के बीच भीषण युद्ध हुआ. इस युद्ध के दौरान रानी लक्ष्मीबाई ने झांसी के किले के भीतर से अपनी सेना का नेतृत्व किया. उन्होंने अपने 14,000 सैनिकों के साथ अंग्रेजी फौज का मुकाबला किया. झांसी के वीर रणबांकुरे ने अदम्य साहस और वीरता दिखाते हुए अंग्रेजों और उनके स्थानीय सहयोगीयों द्वारा किए गए कई आक्रमणों को नाकाम कर दिया.इसी बीच, रानी के सेनानायकों में से एक दूल्हा जू ने उन्हें धोखा दिया. दूल्हा जू किले के एक द्वार के प्रभारी था अंग्रेजों से मिल गया और एक समझौते के तहत उसने प्राय: अभेद्य रहे किले का संरक्षित द्वार को अंग्रेजी सेना के लिए खोल दिया. जब यह तय हो गया कि किले का पतन निश्चित है तो रानी के सेनापतियों और वीरांगना झलकारी बाई ने उन्हें अपने कुछ सैनिकों के साथ झांसी छोड़कर निकल जाने की सलाह दी. मौके की गंभीरता को भांपते हुए, रानी लक्ष्मीबाई अपने सलाहकारों की सलाह पर, भंडारी गेट से घोड़े पर बैठकर, अपने पुत्र और कुछ विश्वासपात्र सैनिकों और परिचारकों के साथ कालपी के लिए सुरक्षित निकल गई. दरअसल, रानी कालपी में डेरा डाले हुए पेशवा नाना साहिब की सेना से मदद का इंतजार कर रही थी जो आ नहीं पाई, क्योंकि तांतिया टोपे (Tantia Tope) पहले ही जनरल रोज से पराजित हो चुके थे. रानी का उद्देश्य कालपी तक पहुंच कर सेना को इकट्ठा करना और एक नए उत्साह के साथ अंग्रेजो के खिलाफ लड़ाई करना था. झांसी को चारों तरफ से घेर लिया गया था. रानी का बच निकलना मुश्किल था. वक्त की मांग रानी और उनके नवजात उत्तराधिकारी दामोदर राव के जीवन की रक्षा की थी. ऐसे विकट समय में झलकारी बाई का रानी से मिलता जुलता रूप वरदान साबित हुआ. अंग्रेजों को भ्रम में डालने की रणनीति के तहत झलकारी बाई ने बेदाग सफेद चंदेरी साड़ी, विशिष्ट पगड़ी, माथे पर अर्धचंद्र का निशान, एक तलवार और एक ढाल के साथ खुद को रानी के रूप में तैयार किया. उन्होंने खुद को रानी के रूप में प्रच्छन्न किया और रानी के स्थान पर लड़ी और अंग्रेजों को दिन भर उलझाए रखा. अपने अंतिम समय में रानी के वेश में युद्ध करते हुए वह अंग्रेजों द्वारा पकड़ी गई, लेकिन इससे रानी को किले से सुरक्षित बाहर निकलने का मौका मिल गया. बाद में वह किले से निकल कर के जनरल ह्यू रोज के शिविर में पहुंचीं और चिल्लाकर कहा कि वह जनरल ह्यूग रोज़ से मिलना चाहती हैं. अंग्रेजी सैनिक और जनरल रोज इस बात से प्रसन्न थे कि उन्होंने ना केवल झांसी रियासत पर नियंत्रण कर लिया है बल्कि जीवित रानी भी अब उनके कब्जे में है. लेकिन यह खुशी ज्यादा देर तक नहीं रही. जब उन्हें पता चला कि जिसे वह रानी  समझ रहे रहे थे वह वास्तव में झलकारी बाई थी तो उन्होंने अपना सिर पीट लिया. जब झलकारी बाई से पूछा गया कि उसके साथ क्या किया जाना चाहिए? तब झलकारी बाई ने बिना विचलित हुए दृढ़ता से कहा- “मुझे फांसी दे दो!”कहा जाता है कि झलकारी बाई के साहस और वीरता से जनरल ह्यूग रोज़ इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने झलकारी बाई को यह कहते हुए रिहा कर दिया कि ” अगर भारत की 1% महिलायें भी उसके जैसी हो जायें तो अंग्रेजों को शीघ्र ही भारत छोड़ना होगा”!

कुछ इतिहासकारों का अलग मत

इसके विपरीत कुछ इतिहासकारों का मत है कि झलकारी बाई युद्ध में लड़ते – लड़ते वीरगति को प्राप्त हुई थीं. जब रानी लक्ष्मीबाई थोड़ा दूर निकल गई तो इसी बीच झलकारी बाई के पति पूरन किले की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए. इससे भी वह विचलित नहीं हुई, पति की मृत्यु का शोक मनाने के बजाय झलकारी बाई ने खुद को रानी लक्ष्मीबाई घोषित करके झांसी की सेना की कमान अपने हाथों में ले लिया और घोड़े पर सवार होकर अंग्रेजों की फौज पर चंडी बनकर टूट पड़ी. कई अंग्रेज अधिकारी और सैनिक झलकारी बाई के हाथों मारे गए. अंग्रेजी सेना में खलबली मच गई और और उनके पैर उखड़ने लगे. तभी एक सनसनाती हुई गोली उनके सीने को चीरती हुई निकल गई. घोड़े से गिरते हीं अंग्रेजों ने उनके शरीर को गोलियों से छलनी कर दिया. इस तरह से वीरांगना झलकारी बाई रानी लक्ष्मी बाई के प्रति सच्ची मित्रता और स्वामीभक्ति, मातृभूमि की रक्षा, और स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों का बलिदान देकर इतिहास में अमर हो गई. राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने झलकारी बाई के अदम्य साहस, बहादुरी और बलिदान की भूरी -भूरी प्रशंसा करते हुए लिखा है-

जा कर रण में ललकारी थी,

वह तो झाँसी की झलकारी थी।

गोरों से लड़ना सिखा गई,

है इतिहास में झलक रही,

वह भारत की ही नारी थी।

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