Ranjeet Bhartiya 08/07/2022
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Last Updated on 08/07/2022 by Sarvan Kumar

हिंदू समाज में गोत्र का बहुत महत्व है. प्राचीन सनातन परंपरा के अनुसार, हिंदू धर्म की सभी जातियों में गोत्र पाए जाते हैं. इससे पहले कि हम मूल विषय पर आएं, संक्षेप में जानते हैं कि गोत्र का अर्थ क्या होता है? गोत्र का शाब्दिक अर्थ होता है- “संतति, संतान, वर्ग, समूह, कुल, वंश, घराना या नस्ल”. अगर गोत्र की परिभाषा की बात करें तो गोत्र मोटे तौर पर उन लोगों के समूह को कहते हैं जिनका वंश एक मूल पुरुष पूर्वज से अटूट क्रम में जुड़ा है. हिंदू मान्यताओं के अनुसार, गोत्र का सीधा संबंध किसी ऋषि से होता है. आरंभ में गोत्रों की संख्या कम थी. लेकिन वर्तमान में गोत्रो की तादाद ज्यादा है और आज गोत्र वर्ग, जाति, स्थान, क्षेत्र, कर्म सभी को दर्शाता है. आइए जानते हैं यादव का गोत्र क्या है? यादवों में पाए जाने वाले गोत्रों की संख्या कितनी है?

यादवों में कितने गोत्र हैं?

यादव एक विशाल समुदाय है, इसीलिए इसमें गोत्रों की संख्या भी बहुत अधिक है. यादवों में पाए जाने वाले गोत्रों की संख्या के बारे में अलग-अलग बातें कहे जाती हैं, लेकिन इस बात पर आम सहमति है कि यादवो के 1700 से अधिक गोत्र हैं. लेकिन मूल रूप से केवल 64/65 गोत्र होते हैं, जिसकी सूची नीचे दी गई है-

1 ) अत्री गोत्र (Atri gotra): अत्रि गोत्र को यदुवंशियों का मूल गोत्र माना जाता है. इस गोत्र की उत्पत्ति अत्रि नामक वैदिक ऋषि से हुई है. अत्रि सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी के मानस पुत्रों में से एक थे. अत्रि हिंदू परंपरा में सप्तर्षि में से एक हैं, और इन्हें ऋग्वेद में सबसे अधिक उल्लेख किया गया है.‌

2 ) अफ्रिया गोत्र (Afriya gotra): इस गोत्र की उत्पत्ति भगवान श्री कृष्ण के परपोत्र वज्रनाभ से हुई है. अर्थात, अफ्रिया गोत्र के यादव द्वारिकाधीश के प्रपौत्र वज्रनाभ के वंशज हैं. हरियाणा के अहिरवाल राज्य पर इनका शासन था. अहीरवाल नरेश और 1857 क्रांति के स्वाधीनता सेनानी राव तुलाराम सिंह इसी गोत्र के थे.इनके मुख्य ठिकाना अहीरवाल (दक्षिणी हरियाणा और उत्तर-पूर्वी राजस्थान और दिल्ली) और पश्चिमी उत्तर प्रदेश है. आज भी दिल्ली में इस गोत्र के 18 गांव आबाद हैं.

3 ) बाबरिया गोत्र (Babriya gotra): यह एक स्वतंत्र गोत्र है. ऐसी मान्यता है कि इस गोत्र के लोग राजा जनमेजय के वंशज हैं. इनका वास स्थान ब्रज (जिसका भू-भाग उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा एवं मध्यप्रदेश में है) और गुजरात में है.

4 ) बनाफर गोत्र ( Banafar gotra ): बुंदेलखंड के बनाफर के वंशज को बनाफर गोत्र का कहा जाता है. प्रसिद्ध यदुवंशी योद्धा आल्हा और ऊदल को इसी गोत्र का माना जाता है. यह मुख्य रूप से बुंदेलखंड में पाए जाते हैं. मध्य प्रदेश के मुरैना, भिंड और सतना जिले के मैहर तहसील में इनकी अच्छी खासी आबादी है.बता दें कि बनाफर भारत में अहीर व राजपूत की उपजाति/गोत्र है.

5 ) बैरगड़िया गोत्र ( Bairgadhiya gotra): बैरगड़िया अहीरों को मतस्य जनपद (दक्षिण राजस्थान) के यदुवंशी राजा विराट का वंशज माना जाता है. काफी समय पहले यह राजस्थान से आकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में बस गए. प्रसिद्ध बजरंगढ़ किले का निर्माण इन्होंने हीं करवाया था.

6 ) बिचवालिया गोत्र: यह मुख्य रूप से हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले और रेवाड़ी जिले के बावल में पाए जाते हैं.

7 ) भटोटिया गोत्र

8 ) भीलोन गोत्र: (खानदान- घोषी ठाकुर अहीर). इनका मुख्य ठिकाना फिरोजाबाद है.

9 ) चिकाना गोत्र

10 ) दातारता गोत्र : यह मुख्य रूप से अहीरवाल में पाए जाते हैं.

11 ) देहमीवाल गोत्र

12 ) डागर गोत्र : ऐसी मान्यता है कि माता यशोदा और रोहिणी इसी गोत्र की थीं. इनका मुख्य वास स्थान पश्चिमी उत्तर प्रदेश, अहीरवाल और गुजरात है.

13 ) दहिया गोत्र: माना जाता है कि इस गोत्र की उत्पत्ति विदर्भ के राजा दहिभद्र यदुवंशी से हुई है.
यह मुख्य रूप से पश्चिमी उत्तर प्रदेश और अहीरवाल में पाए जाते हैं.

14 ) बाबर गोत्र: इस गोत्र के यादवों को राजा कंस का वंशज माना जाता है. यह मुख्य रूप से पश्चिमी उत्तर प्रदेश और दिल्ली में पाए जाते हैं.

15 ) देशवाल गोत्र: (खानदान-कृष्णवंशी). यह मुख्य ठिकाना बागपत और अहीरवाल में पाए जाते हैं.

16 ) ढोलीवाल गोत्र

17 ) ढँढोर: ढँढोर यादवों का एक स्वतंत्र खानदान या गोत्र है. इनके बारे में कहा जाता है कि महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र, खानदेश (मध्य भारत का एक भौगोलिक क्षेत्र जिसमें महाराष्ट्र के उत्तर-पश्चिमी हिस्से के साथ-साथ मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जिले के हिस्से शामिल हैं), और राजस्थान के ढँढोर क्षेत्र से आकर उत्तर प्रदेश के कानपुर और पूर्वांचल क्षेत्र में जाकर बस गए.

18 ) फाटक गोत्र : घोषी ठाकुर अहीर खा़नदान का एक प्रसिद्धि गोत्र जो मथुरा के यदुवंशी राजा दिगपाल यदुवंशी के वंशज हैं. इनका मुख्य ठिकाना ब्रज का मथुरा और शिकोहाबाद आदि इलाकों में है.

19 ) गढ़वाल गोत्र: घोषी ठाकुर अहीर खानदान का प्रसिद्ध गोत्र जो मान्यताओं के अनुसार बलराम जी के पुत्र गदाधारी के वंशज हैं. इनका मुख्य ठिकाना ब्रज है.

20 ) घोषी ठाकुर: घोषी अहीरों का एक प्रसिद्ध स्वतंत्र खानदान या गोत्र है. इनके बारे में कहा जाता है कि यह चेदि के यदुवंशी राजा दमघोष के वंशज हैं. यह मुख्य रूप से ब्रज, मध्यप्रदेश, अफगानिस्तान में पाए जाते हैं. वर्तमान में घोषी खानदान में यदुवंशीयों के 200 अलग-अलग गोत्र पाए जाते हैं.

21 ) गँवाल गोत्र

22 ) गोरिया गोत्र: यह यादवो की गवालवंशी शाखा जो गौ पालन के कारण कालांतर में गवालवंशी के रूप में प्रसिद्ध हुए. यह मुख्य रूप से यदुवंशी राजा गौर के वंशज हैं.

23 ) हाडा गोत्र

24 ) हर्बल गोत्र

25 ) हिंवाल गोत्र

26 ) जादम गोत्र: ऐसी मान्यता है कि इस गोत्र की उत्पत्ति भगवान श्री कृष्ण के पुत्र साम्ब से हुई है. ब्रज में ये घोषी अहीर खानदान में पाए जाते हैं. जैसलमेर के भाटियों का निकास भी इसी गोत्र से है. इनका मुख्य ठिकाना ब्रज, हरियाणा, अलवर, अफगानिस्तान और सिंध है.

27 ) जद्वाल गोत्र

28 ) कमरिया गोत्र: यदुवंशियों का यह प्रसिद्ध गोत्र मूल रूप से यदुवंशी युवराज कमरहंस का वंशज हैं. वर्तमान में इनके 150 अलग-अलग गोत्र हैं. इनका मुख्य ठिकाना ब्रज और मध्य प्रदेश है.

29 ) खारवेल गोत्र : यह राजा खरवेल के वंशज हैं.

30 ) खिमानिया गोत्र: माना जाता है कि यह महाभारत के प्रसिद्ध वीर यदुवंशी योद्धा सात्यकि के वंशज हैं. सात्यकि के वंशज खिमानिया मुख्य रूप से गुजरात में पाए जाते हैं. माडम गोत्र, नंदानिया इसकी शाखाएँ हैं.

31 ) खुखरायण गोत्र: यह मुख्य रूप से पाकिस्तान के सिंध प्रांत में पाए जाते हैं.

32 ) कोशलिया गोत्र: इन्हें यदुवंशी कोशलदेव सिंह का वंशज माना जाता है. इनका मुख्य ठिकाना अहीरवाल है.

33 ) कनिंवाल गोत्र : यह मुख्य रूप से अहीरवाल में पाए जाते हैं.

34 ) काठ गोत्र: यह गुजरात और महाराष्ट्र में पाए जाते हैं. (Gujarat, Maharashtra)

35 ) खोला गोत्र: इनका मुख्य निवास स्थान अहीरवाल है.

36 ) खैर गोत्र: यह मुख्य रूप से पश्चिमी उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में पाए जाते हैं.

37 ) खोसिया गोत्र: यह अहीरवाल में पाए जाते हैं.

38 ) लंबा गोत्र: इनका मुख्य ठिकाना राजस्थान और अहीरवाल है.

39 ) लाखनोत्र गोत्र: यह गुजरात में पाए जाते हैं.

40 ) मकवाणा गोत्र: यह मूल रूप से सिंध प्रांत के मकवाणा के निवासी हैं. मकवाणा से विस्थापित होकर गुजरात में बसने के कारण इन्हें मकवाणा के नाम से जाना जाता है. यह मूल रूप से सम्मा खा़नदान के अहीरों का गोत्र है. इनका मुख्य ठिकाना गुजरात है.

41 ) मेहता गोत्र : यह मुख्य रूप से अहीरवाल में पाए जाते हैं.

42 ) नंदानिया गोत्र: यह गुजरात में पाए जाते हैं.

43 ) निकुम्भ गोत्र: यह मुख्य रूप से अहीरवाल में पाए जाते हैं.

44 ) नहरिया गोत्र: इनका मुख्य ठिकाना दिल्ली मुरादाबाद और बदायूं है.

45 ) पठानिया गोत्र: यह मुख्य रूप से पश्चिमी उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में पाए जाते हैं.

46 ) पन्हार गोत्र

47 ) रौधेले गोत्र: ऐसी मान्यता है कि घोषी ठाकुर अहीर ख़ानदान का एक प्रसिद्ध गोत्र राधारानी के वंशज हैं. इनका मुख्य ठिकाना ब्रज और दिल्ली है.

48 ) रुद्वाल गोत्र

49 ) रहमानिया गोत्र

50 ) राजोलिया गोत्र

51 ) रोहिणी गोत्र: ऐसी मान्यता है कि रोहिणी गोत्र के अहीर दाउ बलराम जी के वंशज हैं. इनका मुख्य ठिकाना ब्रज और मध्यप्रदेश है.

52 ) सौंधेले गोत्र: यह ब्रज में पाए जाते हैं.

53 ) सुल्तानिया गोत्र: यह ब्रज के घोषी ठाकुर अहीर खानदान का प्रसिद्ध गोत्र) है.

54 ) सक्रिय गोत्र

55 ) सिसोदिया/सिसोतिया गोत्र: यह मुख्य रूप से अहीरवाल और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पाए जाते हैं.

56 ) सिकेरा गोत्र: इनका मुख्य ठिकाना ब्रज है.

57 ) सम्मा गोत्र: सिंध से जो यदुवंशी विस्थापित होकर भारत आए वो सम्मा अहीर ख़ानदान कहलाए.

58 ) तोमर/तंवर गोत्र: इनका मुख्य ठिकाना पश्चिमी उत्तर प्रदेश है.

59 ) वत्स गोत्र

60 ) वितिहोत्र गोत्र: वितिहोत्र हयवंशी अहीरों का प्रसिद्ध गोत्र है जो घोषी ठाकुर अहीर ख़ानदान से हैं. ऐसी मान्यता है कि यह माहिष्मती नरेश सम्राट सहस्त्रार्जुन के वंशज हैं. जय मुख्य रूप से मध्यप्रदेश में पाए जाते हैं.

61 ) ठाकरन गोत्र: इनका मुख्य ठिकाना अहीरवाल और पश्चिमी उत्तर प्रदेश है.

62 ) ज़हावत गोत्र

63 ) निर्बान/निर्वाण गोत्र: इनका मुख्य ठिकाना दिल्ली अहीरवाल और पश्चिमी उत्तर प्रदेश है.

64 ) मथुरौट/मधुवंशी गोत्र: यह यादवों का एक स्वतंत्र ख़ानदान है जिनका निकास मथुरा से हुआ था. ऐसी मान्यता है कि यह यदुवंशी राजा मधू के वंशज हैं. राजा मधु के वंशज ही कालांतर में मधुवंशी के नाम से प्रसिद्ध हुए. इनका मुख्य ठिकाना मथुरा है, लेकिन कालांतर में यह विस्थापित होकर उत्तर बिहार में जाकर बस गए.

65 ) कृष्णावत/वृष्णिवंश/ कृष्णौत: यह यदुवंशीयों का एक प्रसिद्ध स्वतंत्र ख़ानदान है जो वृष्णि वंशी माने जाते हैं. बाबा वसुदेव और उनके चचेरे भाई बाबा नन्द दोनों इसी वृष्णि गोत्र से थे.

नोट: यहां यादवों के मुख्य 65 गोत्रों के बारे में बताया गया है. जैसा की शुरुआत में बताया गया है कि यादवों में 1700 से ज्यादा गोत्र है. अगर आपके पास यादवों के किसी महत्वपूर्ण गोत्र के बारे में जानकारी है तो हमें बताएं, ताकि हम ऊपर दिए गए सूची को अपडेट सकें.

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