Ranjeet Bhartiya 31/07/2022
आसमान पर सितारे हैं जितने, उतनी जिंदगी हो तेरी। किसी को नजर न लगे, दुनिया की हर खुशी हो तेरी। रक्षाबंधन के दिन भगवान से बस यह दुआ है मेरी। jankaritoday.com की टीम के तरफ से रक्षाबंधन की बहुत-बहुत शुभकामनाएं! Jankaritoday.com अब Google News पर। अपनेे जाति के ताजा अपडेट के लिए Subscribe करेेेेेेेेेेेें।
 

Last Updated on 31/07/2022 by Sarvan Kumar

यदि आप इंटरनेट पर कुर्मी राजपूत (Kurmi Rajput) के बारे में सर्च करेंगे तो आपको  “Kurmi Rajput Matrimony” नामक एक लिंक मिलेगा, जिसमें विवरण के रूप में लिखा है कि कुर्मी राजपूत पूरे भारत में पाया जाने वाला एक हिंदू समुदाय है. यहां दो महत्वपूर्ण सवाल उठते हैं. पहला, क्या कुर्मी राजपूत हैं? दूसरा, क्या कुर्मी समुदाय का राजपूतों से किसी प्रकार का संबंध है? आइए इन प्रश्नों के उत्तर ढूंढने का प्रयास करते हैं.

कुर्मी राजपूत

कुर्मी भारत में निवास करने वाली एक कृषक और योद्धा जाति है. ऐसा माना जाता है कि यह मूल रूप से वैदिक क्षत्रिय हैं. इस समुदाय के लोग भगवान श्री राम के पुत्र लव के वंशज होने का दावा करते हैं. वहीं, गुजरात के पटेल पाटीदार समुदाय के लोग खुद को श्री राम के पुत्र लव (लेवा पाटीदार) और कुश (कड़वा पाटीदार) का वंशज बताते हैं. भगवान राम का संबंध सूर्यवंश से है. इस मान्यता के आधार पर हम कह सकते हैं कि कुर्मी समुदाय का संबंध सूर्यवंश से है. सूर्यवंश में कई महान और प्रतापी राजा हुए. कालांतर में इस वंश से कई सूर्यवंशी राजपूतों की शाखाएं निकलीं, जैसे कि कछवाहा, बडगूजर, मिन्हास, आदि. जातियों या समुदायों के विकास की प्रक्रिया में कई अनूठे पैटर्न और प्रवृत्तियां देखी गई हैं. कभी-कभी, जातियों के समृद्ध वर्ग नई जातियां बनाने के लिए अपनी मूल जाति से अलग हो जाते हैं. आमतौर पर, ऐसा सामाजिक पदानुक्रम में उच्च स्थिति प्राप्त करने के उद्देश्य किया जाता है. उदाहरण के तौर पर, 1890 के दशक में कलवार क्षत्रिय राजपूत होने का दावा करने लगे. इनमें से कई राजपूत के रूप में जनगणना में शामिल हो गए. कुर्मी अभिजात वर्ग ने कई तरह के रास्तों का अनुसरण किया. कुर्मी जाति के संगठनों ने सामाजिक पदानुक्रम में राजपूतों के समान उच्च की मांग की. गोरखपुर जिले में, 20वीं शताब्दी के दूसरे और तीसरे दशक के दौरान जमींदारों और बड़े काश्तकारों ने मूल जाति (कुर्मी) से नाता तोड़ लिया. इनमें से कुछ ने खुद को राजपूतों के रूप में गिनना शुरु कर दिया. उन्होंने सेंथवार (Sainthwar) नामक एक नई जाति का गठन किया, जो कुर्मियों की एक उपजाति का नाम था. बता दें कि सैंथवार जातियों का एक समूह है जो गोरखपुर क्षेत्र में विभिन्न स्थानों में निवास करते हैं. यह उत्तर प्रदेश और और बिहार की एक जमींदार जाति है.

कुर्मी-सैथवार

उत्तर प्रदेश में कुर्मी-सैथवार समाज की महत्वपूर्ण आबादी है और यह राजनीतिक रूप से प्रभावशाली हैं. शाहिद अमीन ने अपनी किताब “Event, Metaphor, Memory” में सैंथवार को एक मेहनती किसानों की मध्यम श्रेणी की जाति के रूप में वर्णित किया है जो निकटता से कुर्मी समुदाय से जुड़े हुए हैं. कुमार सुरेश सिंह की अपनी किताब “India’s Communities” के अनुसार, सैंथवार क्षत्रियों से संबंधित हैं, और कभी-कभी इन्हें राजपूतों के विभाजन के रूप में वर्णित किया जाता है.


References;

Bayly, Christopher A. (1973). “Patrons and Politics in Northern India”. In Gallagher, John; Johnson, Gordon; Seal, Anil (eds.). Locality, Province and Nation: Essays on Indian Politics 1870 to 1940 (Reprinted ed.). Cambridge University Press Archive. p. 63. ISBN 978-0-52109-811-3.

Kumar Suresh Singh, ed. (1998). India’s Communities. Vol. A–G. Oxford University Press. p. 2163. ISBN 978-0-19-563354-2.

Shahid Amin (1995). Event, Metaphor, Memory: Chauri Chaura, 1922-1992. University of California Press. p. 33. ISBN 978-0-520-08780-4.

Kumar Suresh Singh, ed. (1998). India’s Communities. Vol. A–G. Oxford University Press. p. 2163. ISBN 978-0-19-563354-2.

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