Ranjeet Bhartiya 27/08/2022
नहीं रहे सबके प्यारे ‘गजोधर भैया’। राजू श्रीवास्तव ने 58 की उम्र में ली अंतिम सांस। राजू श्रीवास्तव को दिल का दौरा पड़ा था जिसके बाद से वो 41 दिनों से दिल्ली के एम्स में भर्ती थे। उनकी आत्मा को शांति मिले, मुझे विश्वास है कि भगवान ने उसे इस धरती पर रहते हुए जो भी अच्छा काम किया है, उसके लिए खुले हाथों से स्वीकार करेंगे #RajuSrivastav #IndianComedian #Delhi #AIMS Jankaritoday.com अब Google News पर। अपनेे जाति के ताजा अपडेट के लिए Subscribe करेेेेेेेेेेेें।
 

Last Updated on 27/08/2022 by Sarvan Kumar

हिंदू समाज की चतुष्वर्णीय व्यवस्था में सैकड़ों बनिया उपजातियों शामिल हैं. कलवार, अग्रवाल, सेठ, वैश्य पोद्दार, अग्रहरि, बरनवाल, महेश्वरी, केसरवानी ,लोहिया स्वर्णकार, आदि को वैश्य वर्ण का सदस्य माना जाता है. बनिया समुदाय की एक महत्वपूर्ण उपजाति है- महावर वैश्य. इन्हें व्यवसायिक वर्गों में अग्रणी माना जाता है. इस समुदाय का इतिहास भगवान कृष्ण जितना पुराना है और इन्हें इनके दानवीरता (generosity) के लिए जाना जाता है. आइए जानते हैं महावर (Mahavar) वैश्य समाज का इतिहास, महावर शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई?

महावर वैश्य समाज का इतिहास

महावर वैश्य (Mahawar Vaishya) हिंदू धर्म की मारवाड़ी बनिया जाति की एक श्रेणी, शाखा या उपजाति है. बता दें कि मारवाड़ी भारत का एक प्रमुख व्यापारिक समुदाय (trading community) और दक्षिण एशियाई जातीय-भाषाई समूह (ethno-linguistic group) है जो भारत के राजस्थान के मारवाड़ क्षेत्र से निकला है. इस समुदाय का इतिहास प्राचीन और गौरवशाली है. महावरों का इतिहास भगवान श्री कृष्ण के जितना पुराना है. कई उपलब्ध ऐतिहासिक साक्ष्य हैं जो भगवान कृष्ण के समय में मथुरा उत्तर प्रदेश और द्वारिका गुजरात दोनों में महावरों के अस्तित्व को साबित करते हैं. अंग्रेजों द्वारा महावारों को उच्च जाति के रूप में वर्गीकृत किया गया था (Mahavars were classified as upper caste by the British) 1901 में, जब अंग्रेजों द्वारा तत्कालीन राजपुताना में पहली जनगणना की गई थी, तो पहला कदम विभिन्न जातियों की पहचान करना और सामाजिक स्थिति (social status) के आधार पर उन्हें क्रम में रखना यानी कि वर्गीकृत करना था. इस जनगणना में, ब्रिटिश सरकार ने कई हिंदू समूहों का गठन किया और इन समूहों के तहत जातियों की पहचान और वर्गीकरण किया गया. ब्राह्मण शीर्ष वरीयता प्राप्त थे और उन्होंने तालिका में नंबर एक स्थान प्राप्त किया. हिंदुओं की दूसरी श्रेणी में- राजपूत, खत्री, धनखड़, चरण, भट्ट, कायस्थ, पालीवाल (जैन) और अरोड़ा को वर्गीकृत किया गया. तीसरी श्रेणी में, बनियों को उच्च जाति के रूप में माना गया. बनियों को अग्रवाल, ओसवाल, खंडेलवाल, माहेश्वरी, विजयवर्गीय और महावर आदि के रूप में वर्गीकृत किया गया था. चौथी श्रेणी में जाट मराठा, बिश्नोई, गुर्जर, पटेल, माली अंजना आदि को वर्गीकृत किया गया था.

महावर शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई?

महावर वैश्य समुदाय के लोग बनिया समुदाय में सबसे अच्छा व्यवसायिक वर्ग होने का दावा करते हैं. इनके अनुसार महावर शब्द की उत्पत्ति “महा+वर” से हुई है जिसका अर्थ होता है- “महान व्यवसायी या Great Businessman”.

महावर वैश्य समुदाय कहाँ – कहाँ पाए जाते हैं?

इस समुदाय के लोग पूरे भारत में और विदेशों में भी पाए जाते हैं. लेकिन मुख्य रूप से यह राजस्थान, हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश में निवास करते हैं. राजस्थान में यह मुख्य रूप से अलवर और जयपुर जिलों में पाए जाते हैं. हरियाणा के गुरुग्राम और रेवाड़ी जिलों में इनकी आबादी है. उत्तर प्रदेश की बात करें तो मथुरा, सीतापुर, बिजनौर जिले के हल्दौर और और अमरोहा जिले के हसनपुर में भी इनकी उपस्थिति है. पंजाब के जालंधर और फतेहगढ़ साहिब जिले के मंडी गोबिंदगढ़ में भी इस समुदाय के लोग निवास करते हैं.

धार्मिक आस्था (Religious Belief)

महावर वैश्य समुदाय के लोग आमतौर पर धार्मिक प्रवृत्ति के होते हैं. हिंदू धर्म, वैष्णव (Vaishnavism) और सनातन धर्म में उनकी गहरी आस्था है. इन्हें वैष्णव बनिया (Vaishnav Bania) भी कहा जाता है. यह किसी एक भगवान के भक्त नहीं हैं बल्कि कई हिंदू देवी देवताओं की पूजा करते हैं जैसे भगवान विष्णु, शिव, पर्वती, दुर्गा माता, काली माता, आदि. भगवान श्रीकृष्ण में इस समुदाय के लोगों की विशेष आस्था है. इस समुदाय के लोग आमतौर पर शाकाहारी (vegetarian) होते हैं और शराब का सेवन करने यानी मदिरापान से परहेज करते हैं.

महावर वैश्य समुदाय के उपनाम (Surname)

इस समुदाय के लोग आमतौर पर “गुप्ता” सरनेम लगाते हैं. इनके अन्य उपनाम हैं- बचेला, मावल, दाता, सोनी, महाजन, मोदी और महावर.

महावर वैश्य समुदाय के उल्लेखनीय व्यक्ति

इस समुदाय के लोगों के दावे के अनुसार इतिहास के कुछ प्रसिद्ध महावरों में महान दाता श्री भामाशाह शामिल हैं. जब हल्दी घाटी के युद्ध में पराजित महाराणा प्रताप अपने परिवार के साथ जंगलों में भटक रहे थे, तब दानवीर भामाशाह ने अपनी सारी जमा पूंजी महाराणा को समर्पित कर दी थी. भामाशाह से प्राप्त धन के सहयोग से महाराणा प्रताप में नया उत्साह उत्पन्न हुआ. उन्होंने ने नई सेना बनाई और मुगलों के खिलाफ लड़ते रहे, और अपने काफी क्षेत्र को मुगलों के अधिकार से मुक्त करा लिया. मातृभूमि की रक्षा के लिए महाराणा प्रताप को अपना सब-कुछ न्यौछावर करने वाले भामाशाह अपनी दानवीरता के कारण इतिहास में अमर हो गए.


References;

•https://timesofindia.indiatimes.com/city/jaipur/rajasthans-castes-were-first-classified-by-british/articleshow/24272494.cms

•http://www.mumbaimahawarvaish.com/Index_HistoryMahawarVaish.php

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