Last Updated on 22/10/2022 by Sarvan Kumar
भारत में कई समुदाय और हजारों जातियां निवास करती हैं. विभिन्न जातियों के अपने-अपने पूज्य पुरुष होते हैं जिन्हें गुरु कहा जाता है. उदाहरण के लिए, वाल्मीकि समाज के लोग महर्षि वाल्मीकि को अपना गुरु मानते हैं जिन्होंने आदि धर्म ग्रंथ, संस्कृत महाकाव्य रामायण की रचना की थी. इसी तरह, गुरु जम्भेश्वर को बिश्नोई समाज का गुरु माना जाता है जिन्होंने बिश्नोई समाज की स्थापना की थी. इसी क्रम में आइए जानते हैं चमारों के गुरु कौन हैं.
भारतीय संस्कृति में गुरुओं का महत्व
भारतीय संस्कृति में हमेशा से गुरुओं का महत्व रहा है. गुरु व्यक्ति और समाज के लिए हितचिंतक, मार्गदर्शक, विकास प्रेरक, समाज सुधारक एवं विघ्नविनाशक होते हैं. गुरु अपने त्याग, तपस्या, ज्ञान एवं साधना से व्यक्ति और समाज को अज्ञानता और सामाजिक कुरीतियों के अंधकार से निकालकर सतमार्ग पर चलने की प्रेरणा और नैतिक बल देते हैं तथा समय-समय पर क्रांति का मार्ग प्रशस्त करते हैं. भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान ईश्वर से ऊपर माना गया है और कहा गया है-
“गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥”
अर्थात- गुरु ही ब्रह्म हैं, गुरु ही विष्णु हैं, गुरु ही भगवान् शंकर हैं और गुरु साक्षात परब्रह्म हैं.
चमारों का गुरु कौन हैं?
अब अपने मूल प्रश्न पर आते हैं और जानते हैं चमारों के गुरु कौन हैं. संत शिरोमणि रविदास जी को चमारों का गुरु माना जाता है. सामाज वैज्ञानिक और लेखक बद्री नारायण के अनुसार, “उत्तर भारत में दलितों के लिए भगवान का अर्थ संत रविदास हैं और राम तक पहुंचने का रास्ता रविदास से होकर जाता है. दलित समाज और चमार समुदाय से आने वाले लोगों के लिए रविदास सबसे पूजनीय हैं. उत्तर भारत में फैले दलितों में तीन पंथ या संप्रदाय हैं जो लोकप्रिय हैं- रविदासी, कबीरपंथी और शिवनारायण”. काशी के एक चर्मकार परिवार में जन्मे संत रविदास जी एक महान क्रांतिकारी संत थे. रविदास जी के काल में समाज जात-पात, ऊंच-नीच, छुआ-छूत,धार्मिक आडंबर और ब्राह्मण वर्चस्व आदि अनेक कुरीतियों के अंधकार में डूबा हुआ था. इसके कारण समाज के तथाकथित निम्न वर्गों का जीवन अत्यंत ही कठिन हो गया था. मध्यम और उच्च वर्गों द्वारा निम्न जाति के लोगों का भिन्न-भिन्न प्रकार शोषण किया जाता था. समाज में अंधविश्वास, अन्याय और अत्याचार का बोलबाला था. धार्मिक कट्टरपंथ अपने चरम पर था और मानवता कराह रही थी. समाज में ऊंची जातियों और ब्राह्मण वर्ग का इतना वर्चस्व था कि समाज सुधार की बात करना असंभव था. ऐसे विकट परिस्थिति में जूते बनाकर जीवन निर्वाह करने वाले संत रविदास जी ने समाधि, ध्यान और योग मार्ग अपनाते हुए मानवता के कल्याण के लिए असीम अध्यात्मिक ज्ञान अर्जित किया और पीड़ित समाज एवं दीन-दुखियों की सेवा कार्य में जुट गए. रविदास जी ने अपनी रचनाओं, उपदेशों और ज्ञान के माध्यम से समाज में व्याप्त इन सभी कुरीतियों का विरोध किया और प्रेम, भक्ति, संतोष और समानता का संदेश देकर इन सभी सामाजिक बुराइयों को दूर करने में अहम योगदान दिया और समाज को जागृत करके नई दिशा दिखाने का प्रयास किया. यहां यह स्पष्ट कर देना जरूरी है कि संत रविदास जी केवल चमार समाज, दलितों के ही गुरु नहीं है. साधु-संतो के बारे में कहा गया है-
“जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान,
मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।”
अर्थात,
साधु जात पात के बंधनों से परे होते हैं, उनकी कोई जाति नहीं होती है. साधु-संतों से उनकी जाति नहीं पूछना चाहिए बल्कि साधु का ज्ञान ग्रहण करना चाहिए.
संत रविदास की शिक्षाएं आज हर जाति और हर समुदाय के लिए आज भी प्रासंगिक हैं.
References:
•उपेक्षित समुदायों का आत्म इतिहास
2006
•https://hindi.theprint.in/india/punjabs-dalits-are-changing-the-politics-of-the-state-crowds-are-gathering-in-churches-and-chamar-pride-is-singing/245364/
•https://hindi.theprint.in/opinion/know-the-reasons-of-anger-after-demolishing-sant-ravidas-temple-through-bihars-village/81055/
